जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!
हमारे उपनिषदों ने भी उपयोग से किसी को मना नही किया ,उपयोग तो करना हैं कुछ मिला हैं उपयोग के लिए ही मिला हैं लेकिन "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम्.” त्याग भाव से उपयोग | त्याग भाव क्या उसका मान कर के उपयोग,अपना अहम का त्याग ,अपनी egoistic feeling का त्याग और अपनी Iness और Myness ,मैं और मेरा उस का त्याग करके उपयोग करे | भोगकी परम्परा ये ही इसी विचार के साथ हैं | भगवान के आगे जब रखते हैं हम कृतज्ञता,आस्था तो हैं ही ,विश्वास भी हैं के भगवान भाव के भूखे हैं वो स्वीकार करते हैं कर सकते हैं लेकिन मेरा भाव उस level ऊंचाई के स्तर का हैं तो,कृतज्ञता तो निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं |
और एक बात और हैं बिलकुल practical life से जुड़ी हुई व्यवहारिक जीवन के साथ जुड़ी हुई वो ये की जब आप इस रूप में करेंगे की भगवान को भोग लगाना हैं ,भगवान के आगे पहले रखकर खाना हैं | तो आप सोचे बहुत सी समस्याओ से अपने आप बचाव होने लगेगा | तब अभक्ष्य भक्षण बनाते हुए या खाते हुए क्या लगेगा नही ?के भगवान को भोग लगाना हैं इस चीज का? या रसोई में भगवान का भोग बनना हैं तो ये चीज ? तो शुद्धिकरण रसोई का जिसे हमारे यहाँ अन्नपूर्णा मंदिर कहा जाता हैं | शुद्धिकरण आहार का | purification हमारी feelings की ,हमारे diet की ,हमारे kitchen की अपने आप होने लगेगी | भावो की शुद्धि भी होगी | जब हम ये सोचेंगे की मेरे प्रभु भोग लगाएंगे..!! तो भाव भी हमारे अच्छे बनेंगे विचारो के feelings में भी अच्छा भाव आएगा | हर रूप में लाभ ही लाभ हैं |
और एक बात और भी हैं के जब हम भगवान के आगे रखेंगे | भगवत भाव हमारे भीतर होगा और भगवत भाव जब इधर से उधर भगवान के तरफ मुड़ेगा तो भगवान की कृपा दृष्टि उस पदार्थ में साथ मिलेगी और इसलिये एक सहज सा भाव आप सब जानते हैं की जब हम भगवान की सामने कुछ रखते हैं तो वो भोजन होता हैं लेकिन जब हम उठाते हैं तो वो भोजन नही होता वो प्रसाद बन जाता हैं ,वो प्रसाद होता हैं | प्रसाद हम उठाते हैं और प्रसाद पाते हैं और ये भी विश्वास रखे हमारी भावना निश्चित रूप से उसे प्रसाद बना सकती हैं | मीरा का भाव भी था जिसने विष को अमृत बनाया था और कुछ भी नही | कोई वह science नही थी | कोई किसी तरह की modern technology नही थी ,नही काम कर रही थी |कोई जादू टोना नही, कुछ भी नही था | कोई दवा नही थी | क्या था ? मीरा की जो feelings थी उसमे कृष्ण भाव रमा हुआ था |
मीरा ने मान लिया था विश्वास कर लिया था की मेरे लिए मेरे गिरिधर गोपाल का चरणामृत हैं क्युकी एक बार शब्द कान में पढ़ गया था की राणा ने चरणामृत भेजा हैं और मीरा ने ये विश्वास कर लिया की ये चरणामृत ही हैं मेरे लिए और भाव उस विष को पीते समय मीरा ने विष को अपने चिंतन में नही आने दिया |अपनी feelings में नही विष को आने दिया इसलिये उसकी feeling poisonous नही थी ,विषैली नही थी ,feeling में पूरी तरह से अमृत भरा हुआ था | कौनसा ? उसके नाम का | उसकी कृपा का | उसके भाव का | उसपर विश्वास का | और उसी का परिणाम था मीरा के उस positive feeling ने जो negative poisonous feeling थी उसे दबाया ,समाप्त किया और विष भी अमृत बना |
तो आप विचार करे के जब मीरा विष को अमृत बना सकती हैं केवल भगवत भाव बना कर उसका चरणामृत मानकर | तो हम भोजन को क्यों नही प्रसाद बना सकते ? बना सकते हैं | बन सकता हैं और इसलिये ये संकेत हैं लाभ ही लाभ हैं इसके | no harm at all | no side effects at all | कोई भी side effect नही | नुकसान का तो कोई प्रशन नही |
इसीलिए खाने से पहले एक भगवत भाव हो | और मानलो आप इतना आप नही भी कर पाते तो ये भाव तो आप बना ही ले जब खाने लगे एक बार भगवान का स्मरण करले और स्मरण करके मन ही मन अपने प्रभु से कह दे यदि कोई मंत्र आता हैं |
हर क्रिया के साथ भगवत भाव | गीता का वह श्लोक वह भाव स्मरण रहे मामनुस्वर युद्ध च ,मेरा स्मरण करता रह और जीवन के व्यवहार में लगा रह और स्मरण में ये तो नित्य प्रति ही|और सब क्रियाएँ साथ साथ होंगी और भगवत भाव चलेगा लेकिन ध्यान प्रातः काल का नियम | बीच में जब अवसर मिले कुछ क्षण ध्यान का अभ्यास फिर से करले | एक बार फिर से अपनी वृतियों को meditative बनाये | ध्यान के अभ्यास में जोड़े एकाग्र करे और आये कुछ क्षणों के लिए भगवत भाव में stability ,स्थिति, एकग्रता ,complete concentration, और अनुभव करे ,देखे उस एकग्रता का जब हम उसके भाव में एकाग्र करते हैं कैसी शांति कैसा आनंद ,कैसी ऊर्जा ,कैसी दिव्यता ,कैसी divinity,energy ,peace ,bliss everything you will realize in your inner self ,ध्यान के क्षणों में आओ कुछ क्षण इस भाव में ,आगे के बात फिर और आगे जीवन के बात जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने के लिए जीवन के हर पहलू को स्पर्श करते हुए शुभ कामनाओ के साथ जय श्री कृष्ण..!!
गीता सत्संग वीडियो-12- (वीडियो-लिंक)
हमारे उपनिषदों ने भी उपयोग से किसी को मना नही किया ,उपयोग तो करना हैं कुछ मिला हैं उपयोग के लिए ही मिला हैं लेकिन "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम्.” त्याग भाव से उपयोग | त्याग भाव क्या उसका मान कर के उपयोग,अपना अहम का त्याग ,अपनी egoistic feeling का त्याग और अपनी Iness और Myness ,मैं और मेरा उस का त्याग करके उपयोग करे | भोगकी परम्परा ये ही इसी विचार के साथ हैं | भगवान के आगे जब रखते हैं हम कृतज्ञता,आस्था तो हैं ही ,विश्वास भी हैं के भगवान भाव के भूखे हैं वो स्वीकार करते हैं कर सकते हैं लेकिन मेरा भाव उस level ऊंचाई के स्तर का हैं तो,कृतज्ञता तो निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं |
और एक बात और हैं बिलकुल practical life से जुड़ी हुई व्यवहारिक जीवन के साथ जुड़ी हुई वो ये की जब आप इस रूप में करेंगे की भगवान को भोग लगाना हैं ,भगवान के आगे पहले रखकर खाना हैं | तो आप सोचे बहुत सी समस्याओ से अपने आप बचाव होने लगेगा | तब अभक्ष्य भक्षण बनाते हुए या खाते हुए क्या लगेगा नही ?के भगवान को भोग लगाना हैं इस चीज का? या रसोई में भगवान का भोग बनना हैं तो ये चीज ? तो शुद्धिकरण रसोई का जिसे हमारे यहाँ अन्नपूर्णा मंदिर कहा जाता हैं | शुद्धिकरण आहार का | purification हमारी feelings की ,हमारे diet की ,हमारे kitchen की अपने आप होने लगेगी | भावो की शुद्धि भी होगी | जब हम ये सोचेंगे की मेरे प्रभु भोग लगाएंगे..!! तो भाव भी हमारे अच्छे बनेंगे विचारो के feelings में भी अच्छा भाव आएगा | हर रूप में लाभ ही लाभ हैं |
और एक बात और भी हैं के जब हम भगवान के आगे रखेंगे | भगवत भाव हमारे भीतर होगा और भगवत भाव जब इधर से उधर भगवान के तरफ मुड़ेगा तो भगवान की कृपा दृष्टि उस पदार्थ में साथ मिलेगी और इसलिये एक सहज सा भाव आप सब जानते हैं की जब हम भगवान की सामने कुछ रखते हैं तो वो भोजन होता हैं लेकिन जब हम उठाते हैं तो वो भोजन नही होता वो प्रसाद बन जाता हैं ,वो प्रसाद होता हैं | प्रसाद हम उठाते हैं और प्रसाद पाते हैं और ये भी विश्वास रखे हमारी भावना निश्चित रूप से उसे प्रसाद बना सकती हैं | मीरा का भाव भी था जिसने विष को अमृत बनाया था और कुछ भी नही | कोई वह science नही थी | कोई किसी तरह की modern technology नही थी ,नही काम कर रही थी |कोई जादू टोना नही, कुछ भी नही था | कोई दवा नही थी | क्या था ? मीरा की जो feelings थी उसमे कृष्ण भाव रमा हुआ था |
मीरा ने मान लिया था विश्वास कर लिया था की मेरे लिए मेरे गिरिधर गोपाल का चरणामृत हैं क्युकी एक बार शब्द कान में पढ़ गया था की राणा ने चरणामृत भेजा हैं और मीरा ने ये विश्वास कर लिया की ये चरणामृत ही हैं मेरे लिए और भाव उस विष को पीते समय मीरा ने विष को अपने चिंतन में नही आने दिया |अपनी feelings में नही विष को आने दिया इसलिये उसकी feeling poisonous नही थी ,विषैली नही थी ,feeling में पूरी तरह से अमृत भरा हुआ था | कौनसा ? उसके नाम का | उसकी कृपा का | उसके भाव का | उसपर विश्वास का | और उसी का परिणाम था मीरा के उस positive feeling ने जो negative poisonous feeling थी उसे दबाया ,समाप्त किया और विष भी अमृत बना |
तो आप विचार करे के जब मीरा विष को अमृत बना सकती हैं केवल भगवत भाव बना कर उसका चरणामृत मानकर | तो हम भोजन को क्यों नही प्रसाद बना सकते ? बना सकते हैं | बन सकता हैं और इसलिये ये संकेत हैं लाभ ही लाभ हैं इसके | no harm at all | no side effects at all | कोई भी side effect नही | नुकसान का तो कोई प्रशन नही |
इसीलिए खाने से पहले एक भगवत भाव हो | और मानलो आप इतना आप नही भी कर पाते तो ये भाव तो आप बना ही ले जब खाने लगे एक बार भगवान का स्मरण करले और स्मरण करके मन ही मन अपने प्रभु से कह दे यदि कोई मंत्र आता हैं |
ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।जस्वि नावधीतमस्तुमा विद्विषावहै।
या
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||
यदि आप कर पाये उच्चारण well and good ,बहुत अच्छा | मानलो नही कर पाते तो एक सहज feeling बनले , भाव बनाले | मेरे नाथ तेरा दिया हुआ प्रसाद हैं पा रहा हूँ | बस इतना सा भाव बनाये उसके बाद कुछ खाए कुछ मुँह में डाले | पहले उसका स्मरण | बात चल रही जीवन की, जीवन के लिए ,जीवन के साथ जीवन को अच्छे ढंग़ से कैसे जिये ? और उसी में आज का ये एक विशेष विचार के खाने से पहले उसका स्मरण उसके प्रति अर्पण का भाव ,उसके प्रति कृतज्ञता का भाव | जिसे हमरी आस्था ने भोग लगाने का शब्द दिया | आप अपने भाव के अनुसार उसे कर सकते हैं |हर क्रिया के साथ भगवत भाव | गीता का वह श्लोक वह भाव स्मरण रहे मामनुस्वर युद्ध च ,मेरा स्मरण करता रह और जीवन के व्यवहार में लगा रह और स्मरण में ये तो नित्य प्रति ही|और सब क्रियाएँ साथ साथ होंगी और भगवत भाव चलेगा लेकिन ध्यान प्रातः काल का नियम | बीच में जब अवसर मिले कुछ क्षण ध्यान का अभ्यास फिर से करले | एक बार फिर से अपनी वृतियों को meditative बनाये | ध्यान के अभ्यास में जोड़े एकाग्र करे और आये कुछ क्षणों के लिए भगवत भाव में stability ,स्थिति, एकग्रता ,complete concentration, और अनुभव करे ,देखे उस एकग्रता का जब हम उसके भाव में एकाग्र करते हैं कैसी शांति कैसा आनंद ,कैसी ऊर्जा ,कैसी दिव्यता ,कैसी divinity,energy ,peace ,bliss everything you will realize in your inner self ,ध्यान के क्षणों में आओ कुछ क्षण इस भाव में ,आगे के बात फिर और आगे जीवन के बात जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने के लिए जीवन के हर पहलू को स्पर्श करते हुए शुभ कामनाओ के साथ जय श्री कृष्ण..!!

No comments:
Post a Comment