श्री राधा कृष्णा भ्याम् नमः,
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!!!
जीवन की बात को लेकर एक बार फिर आप सबको जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!
जीवन महत्व पूर्ण हैं लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण हैं " जीवन को जीने का ढंग़ " | जीवन को हम अच्छे से जी पाये,ये वास्तविकता में महत्व पूर्ण हैं और उसी के लिए एक दिनचर्या ,daily routine प्रातः कल आँख खुलने से पहले ,रात्रि सोने तक हम दिन के व्यवहार को,दिन की क्रियाओ को कैसे आगे बढ़ाये ? उसी पर कुछ बात की जा रही हैं | प्रातः कल का ध्यान meditation हमारी चर्चा का विषय रहा और उसके अनेक पक्ष,अनेक पहलू हमने विचार किये की ध्यान क्यों ? क्यों परमात्मा का भजन ? क्यों प्रातः कल उठकर नियम ? कैसे करे ? क्या क्या उसमे बाधाए हैं ? उसमे बाधाए हैं ?obstacles हैं ? और उसे हम कैसे handle करे ? उसका कैसे हल निकाले ? उस पर विचार किया गया...!!!
अब आगे आओ थोड़ा और आगे बढे जीवन की बात के साथ | ध्यान की पश्चात कुछ स्वाभाविक हैं कुछ खाने पीने की बात | उसमे एक बात एक तो सात्विक आहार , normal diet ,सात्विक रूप में खाये | अच्छा खाये स्वास्थ्य वर्धक खाये | वो न खाये जो खा सके,वो खाये जो पचा सके | उतना न खाये जितना खा सके ,उतना खाये जितना पचा सके ये आयुर्वेद का एक सिद्धांत हैं |
और खाने में भी सात्विकता भी रहे और साथ साथ ये भी ध्यान रहे की अभक्ष्य भक्षण बिलकुल भी नही | एक परम्परा जो हमारे धर्म में विशेष रूप से मान्य हैं और प्रेरणा के रूप में बार बार कही भी जाती हैं की भगवान को भोग लगाना | बहुत से लोगो को लगता हैं की ये परम्परा एक blind faith ,केवल एक अन्धविश्वास परम्परा हैं जिसका कोई meaning आज की इस scientific age में, वैज्ञानिक युग में और आज की इस advanced technology के युग में ,जबके इंसान इतनी ऊँची उड़ान की बात कर रहा हैं | इतनी नए नए संधान ,नए नए अविष्कार ,नए नए वस्तुएॅ यहाँ तक पहुंचा हैं | तो ऐसे समय में भगवान को भोग की बात करना कहीं कहीं कुछ एक को लगता हैं की ये just meaningless बात हैं ,कोई अर्थ इसका नही बैठता लेकिन नही, हम आपको आज स्पष्ट करना चाहँगे ,बताना चाहँगे ..!!
की हमारी परम्परा जो हैं ये आस्था,श्रद्धा और भाव की परम्परा तो हैं ही लेकिन साथ साथ बहुत उपयोगी ,बहुत useful fruitful tradition हैं | बहुत अच्छी परम्परा हैं और बड़ी वैचारिक बड़ी,वैज्ञानिक ,बहुत प्रकार से अनेक लाभ देने वाली परम्परा हैं ये भोग लगाने की परम्परा | जो लोग ये सोचते हैं की भगवान कहा खाते हैं ,ये तो केवल एक blind faith की बात हैं की भगवान खाते हैं | भगवान खाते हैं वो तो लेकिन blind faith नही ये भाव की बात हैं | भाव हैं तो निश्चित रूप से भगवान स्वीकारते हैं ये आप विश्वास रखे क्युकी हमारे भगवान केवल और केवल एक ही बात के पक्षधर हैं ,एक ही भाव के ,एक ही बात के भूखे कहो या इछुक कहो| कोई भी शब्द लगाओ वो हैं प्रेम, वो हैं भाव ...!!
सत्य हैं वो सब को खिलाता हैं उसके यहाँ कोई कमी नही ,ये सत्य हैं के सब कुछ उसी का दिया हुआ हैं | और उसी के ही दी हुई वस्तु उसी के आगे रखना ,उसे के अर्पण करना कोई बहुत बुद्धिमता के बात नही दिखती |लेकिन इसमे भी हमारा एक तर्क हैं के हमारी कृतज्ञता के भावना हैं इसके पीछे जो feeling of gratitude हैं , कृतज्ञता का भाव हैं उसको आप समझे | पुत्र कुछ कमाता हैं और कमा कर के अगर वो पहली कमाई आते ही अपने पिता के हाथ में रखता हैं के अपकी कृपा,आपके आशीर्वाद से मैं इस योग्य हुआ हू | आपका दिया हुआ हैं आपके अर्पण हैं तो आप इस level पर विचार करे के पिता वो कितना प्रसन्न होगा पुत्र के इस कृतज्ञता के भाव से भले ही वो उसकी कमाई पुत्र को लोटा दे लेकिन आप इस feeling को समझे कितनी प्रसन्नता होगी पिता को|इस भाव से सच माने, विश्वास करे जब हम भगवान के दी हुई वस्तु उपयोग से, पहले प्रयोग से पहले भगवान के अर्पण करते हैं तो निश्चित समझे भगवान को भी वैसे ही उससे भी अधिक प्रसन्नता होती हैं के ये जीव कृतज्ञ हैं कृतघ्न नही | इस जीव को याद हैं स्मरण हैं उस स्मरण के साथ वस्तु का प्रयोग कर रहा हैं |
गीता सत्संग वीडियो-११-(वीडियो-लिंक)

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