Thursday, 12 November 2015

गीता सत्संग-1


सबको जय श्री कृष्ण...!!!
आइये एक बार फिर करते हैं जीवन की बात,अच्छे जीवन के लिए,जीवन को बनाने के लिए,एक संकेत किया गया था की हम मकान बनाये और कुछ बनाये,बुरा नही,लेकिन उसके साथ साथ अपने जीवन को बनाये...

एक बात ये भी स्पष्ट करले की बिगड़ना बहुत आसान हैं,बनना थोड़ा मुश्किल हैं यधपि असंभव नही,जैसे आप ये समझे की चढ़ना कुछ मुश्किल होता हैं,लेकिन गिरना मुश्किल नही होता,गिरना तो जरा सा पाँव फिसला और निचे कुछ समय भी नही लगेगा ,देर भी नही लगेगी और उसके लिए कुछ एफ्फोर्ट्स भी नही हैं,मेहनत भी नही हैं लेकिन जब चढ़ना होता हैं तो आप जानते हैं की उसके लिए तो एफ्फोर्ट्स होते ही हैं और एक बात साथ और जीवन की लिए समझले चढ़ना वैसे भी मुश्किल हैं लेकिन एक बार गिरकर फिर चढ़ना और भी मुश्किल हो जाता हैं जैसे कमाना मुश्किल हैं लेकिन गवाना बिलकुल मुश्किल नही,गवाने में कुछ नही लगता,की हुई कमाई कभी भी गवाई जा सकती हैं ,कमाने में एफ्फोर्ट्स हैं ,बनने में एफ्फोर्ट्स हैं,बिगड़ने में नही जैसे चढ़ने में एफ्फोर्ट्स हैं गिरने में नही और इसीलिए बहुत जरुरी हैं की जीवन को बनाने की ओर चले,बिगड़ गए तो फिर बनना वैसे ही और मुश्किल हो जायेगा जैसे एक बार गिर कर फिर से चढ़ना ..!आओ जीवन को बनाने के लिए कुछ प्रयास करे..! कुछ भाव बनाये ..! कुछ मन बनाये ..!

जहा बनाने की बात थी वहा कहा जा रहा था की अगर जीवन में हम अहम के साथ जीते हैं इगोइस्टिक फीलिंग के  साथ ,'मैं' के  साथ ,अहंकार के  साथ ,तो वह जीवन के  बिगड़ने की शुरुवात होती हैं..जहा हम जीवन में बहुत हाइपर,इररेटेट,क्रोधित स्वभाव रखकर जीते हैं,वो भी जीवन का एक बिगाड़ हैं,जीवन के बनने की स्तिथि नही हैं |

और ऐसे ही एक बात और पीछे कही गयी की जहा हम आसक्तियों में सिमटे हुए जीते हैं,मेरापन में वहा भी जीवन में डाउन फॉल ही,मानसिक रूप में होता हैं और अपलिफ्ट ,उत्थान ,जीवन में ऊँचा चढ़ने की बात ,जीवन में कुछ बनने की बात आओ आज एक बढ़ा मीठा सा भाव पर थोड़ी देर बात करते हैं बहुत मीठा सा भाव और आपको लगेगा की ये भाव वास्तव में जीवन की एक मिठास हैं 

वो भाव हैं "कृपा" का भाव..एक पक्ष हैं किसी भी वस्तु में की ये देखना की ये मेरा और एक पक्ष हैं किसी वस्तु को इस रूप में देखना की ये भगवन की कृपा..!और सच में कृपा देखने का स्वभाव  बन जायेगा तो आप को लगेगा के जीवन में कुछ अलग सा आनंद ,वही मकान हैं,दृष्टि बढ़लेगी,के ये मेरा नही ये उसकी कृपा का प्रसाद हैं ..

और इसीलिए हमारी परम्पराओ में परम्परा रहती हैं के घर के बाहर भी भगवन का नाम शायद भारत से बाहर में किसी को कुछ कठिनाई रहती हो लेकिन हमे नही लगता के अपनी परम्पराओ में रहना ,परम्पराओ को निभाना या अपनी परम्पराओ को सामने रखना उसमे कही कोई प्रतिबंध होगा या कोई कठिनाई होगी हमे नही लगता और एक बात हम और भी कहे के अपने धर्म अपनी परम्परा अपनी संस्कृति और अपने भगवन के भाव को आगे  रखने में हमे किसी भी तरह का संकोच कोई हिचकिचाहट या कोई शर्म का भाव होना भी नही चाहिए ,इसे तो  हम गौरव में ले..घर के बाहर जब यह कहा जाता हैं  के कोई भगवन का नाम एंट्रेंस पर लिखा हुआ हो वो क्यों हैं?के जब हम घर में एंटर करे ,जब हम घर में प्रवेश करे तो हमे दिखे के ये भगवन के कृपा हैं कोई भी वस्तु हैं हम उसे भगवन की कृपा मान कर प्रयोग करे..


कृपा को प्राप्त करने का एक बढ़ा आसान सा ढंग़ हैं आगे कृपा बनी रहे उसका एक आसान सा ढंग हैं की पहले जो कुछ हैं उसमे उसकी कृपा को देखने का स्वभाव बनाये,उसमे हम उसकी कृपा को स्वीकार करने का भाव बनाये..ये नही जो हैं की उसमे तो  हम अपनी ईगो बनाले,अपना अहम बनाले,उसमे तो हम यह सोचते रहे की ये मैं ,ये मेरा ,मैं इसीलिए बड़ा,मेरे पास इतना कुछ ,मेरे पास ये ,मेरे पास वो और आगे हम ये भी चाहे की भगवन की कृपा भी आगे  और तो  दोनों बातो में थोड़ा सा कंट्रास्ट,कंट्राडिक्शन हैं | चाहते हैं हम उसकी कृपा बनी रहे तो जो पहले हैं उसमे उसकी कृपा का अनुभव करो उसे प्राप्त करके उसकी कृपा का धन्यवाद करो..!!! 


हैं ये प्रशन आपके मन में कभी उठ सकता हैं की कभी कभी कोई परस्तिथि हमारे अनुकूल नही होती तो वहा कैसे हम कृपा देखे तो दोनों बाते हैं ..अनुकूल में हम कृपा देखे..वो तो देखे ही..वो तो कृपा ही... लेकिन अगर हमे कभी लगता हैं की कोई थोड़ा सा हमारे अनुकूल नही हैं तो वहा भी प्रयास करो की ये भी कोई तेरी इच्छा होगी ,ये भी कोई तेरी कृपा होगी ,किस रूप में होगी ये तू जान ,ये भी तेरी लीला होगी ,मेरे गोविन्द ,मेरे ठाकुर ,उसमे भी आप उसका भाव बनाएंगे तो उसके कोई लाभ हैं ..

एक स्तिथि तो इसमे ये हैं विचार के जब भी कोई प्रतिकूलता आती हैं वो कही न कही चेताने के लिए आती हैं ,कुछ हमे और अलर्ट करने लिए ,अवेयर करने के लिए ,कुछ हमे जगाने के लिए ,कुछ पक्का करने के लिए आती .. के ऐसा नही ऐसा ,ये इस ढंग़ से चलो ,अलर्ट करती हैं ,एक बात तो ये हैं और हम थोड़ा अलर्ट हो जाये के कही कोई प्रतिकूलता हैं  तो हम देखे अपने आपको, के हमे नही, ऐसा नही, के अब ऐसा जीवन जीना हैं ...आप देखते ही हैं के  माँ प्यार भी देती हैं ...कभी कभी माँ थोड़ा डांट भी सकती हैं और डांट भी देती हैं..!!!


गीता सत्संग वीडियो -1 (विडियो लिंक) 

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