Monday, 30 November 2015

गीता सत्संग-17

एक बार पुनः सबको जय श्री कृष्ण ..!!!
आप जानते हैं गाड़ी आगे अपने लक्ष्य में गंतव्य में पहुंचने में इतनी मुश्किल नही लेकिन ट्रैक पे आना और गाड़ी का चल पढ़ना बस वहा तक,गाड़ी इससे ट्रैक पर आयेगी मन की ओर,लक्ष्य की ओर,आनंद की ओर बढ़ निकेगी आप इसे करे |

एक छोटी सी समस्या उसको भी हम लेते चले बहुत लोगो को ऐसा भी लगता हैं | की जब पाठ में बैठते हैं ,ध्यान में बैठते हैं तो कही न कही नींद का असर होने लगता हैं | बैठते तो पाठ में हैं ध्यान में हैं लेकिन बैठते ही मन ध्यान में एकाग्र होने की स्थान पर sleeping mode में चला जाता हैं और ऐसी स्थिति हो जाती हैं और उठते हैं तो फिर लगता हैं बैठे तो थे निराशा सी,देखो अंदर की awareness लेके बैठे ,अंदर से  जागरूकता लेके इसीलिए पहले कहा गया जो बात हैं की थोड़ा सा व्यायाम थोड़ी सी exercise ,प्राणायाम या कोई शारीरिक सजगता वो भी जरुरी हैं | लकिन साथ साथ मानसिक awareness मन से  जागरूक बैठे | मन पर अंकुश रखे ये समय सोने का नही ये समय ध्यान का हैं, भजन का हैं ओर फिर भी ये लगे के मन नही एकाग्र हो रहा ,नींद के ओर जा रहा हैं तो ध्यान छोड़ दे कुछ क्षणों के लिए या तो बोलकर कीर्तन प्रारम्भ करदे | भगवन का नाम loudly उच्चारण करे ,हल्की हल्की ताली भी बजानी पढ़े तो भी बजाए | थोड़ा सा सजगता लाने के लिये कीर्तन प्रारम्भ करदे बोलकर के कुछ नाम उच्चारण करे तो उससे क्या होगा कुछ क्षण सजगता आयेगी | और फिर भी लगे खड़े भी होना पड़े कुछ क्षणों के लिये आप खड़े हो जाये | खड़े होकर ताली बजा कर या हल्का मंजीरा लेकिन जागरूक | होता क्या हैं उस समय हम जागरूक नही रहते जब हल्की सी नींद आती हैं आते आते नींद ही हावी हो जाती हैं | 

नींद के सुख में ही मन चला जाता हैं जैसे नींद आने लगे उसी क्षण, आप उसी क्षण ध्यान को छोड़ दे | उसी क्षण आप जाप करे बोलकर के जाप करे या कोई भगवान से आप प्रार्थना करने लगे |भगवान से कहने लगे "मन तुझमे लगे तेरा नाम जपे,मन तुझमे लगे तेरा नाम जपे,मन तुझमे लगे तेरा नाम जपे, मन तुझमे लगे तेरा नाम जपे,गोबिंद हरे गोपाल हरे ,गोबिंद हरे गोपाल हरे" कोई ऐसी प्रार्थना भगवान से करने लग जाये ,भगवान को निहारे ,उनसे कहे के आप बल दो ,शक्ति दो और फिर जब लगे जागरूकता आयी हैं ,सजगता आयी हैं ,शरीर में भी और अंदर मन में भी ,awareness आयी हैं तो फिर बैठ जाये |

और बैठ कर के फिर वही process वही प्रक्रिया वही भाव अंदर की जागरूकता के साथ फिर कोशिश करे अंदर से मन की वृति लगे ,अंदर की तार जुड़े ,मन का connection मिले और उसी ढंग से अंदर ही अंदर या जो नाम धुन  अपने बाहर वाणी से उच्चारण की उसी को ही अंदर अपने ध्यान का विषय बनाये उसी भाव से आप अपने आपको ध्यान में  ले चले या फिर अपने गुरु मंत्र के सहारे नाम की सहारे या केवल ॐ के आश्रय से |

आगे की बात फिर आगे अभी शुभ कामनाओ के साथ जय श्री कृष्ण...!!!  

गीता सत्संग-16

एक बार पुनः सबको जय श्री कृष्ण ..!!!
हो सकता हैं यहा कुछ लोगो को ऐसा भी लग रहा हो | कुछ लोग सोच रहे हो के क्यों ये जीवन के necessity हैं ? क्यों जीवन के सबसे पहली आवयश्कता हैं? कोई इसके पीछे तर्क logic ? there are logics | कोई भी बात आपसे बिना logic के नही की जायेगी | जो भी आपसे कहा जा रहा हैं  वो पूरी तरह तर्कसंगत logical arguments | सच में ये हमारा सनातन, वैदिक हिन्दू धर्म ही हैं | जहा logics हैं और जहा question answer की जिज्ञासा समाधान की छूठ हैं | जहा आप पूछ सकते हैं कह सकते हैं what ,why ,how क्या ,क्यों ,कैसे की यदि कही permission हैं तो केवल हमारी संस्कृति में Indian culture में ,भारतीय संस्कृति में और इसलिए एक बात और आपसे कह दे की हमे अपनी सांस्कृत परम्पराओ की प्रति निश्चित रूप से गौरानवृत् होना चाहिए | we should proud of our cultural values,our traditional cultural,our सनातन हिन्दू धर्म | we should be proud of हमे गर्व होना चाहिए | यहाँ तर्क हैं आप अपने मन की बात कह सकते हो और उसका उत्तर ले सकते हो | 

और जो बात चल रही थी की कोई कहे की ये क्यों जीवन की आवशकता हैं ? और आवशयकता में भी जो first and firm must necessity सबसे पहली और बड़ी आवशकता क्यों ? इसलिए की जीवन में जो हम चाहते हैं वो बिना इसके नही | हमारे जीवन की पहले आवश्यता क्या हैं ? एक क्षण के  लिए चलो आपके साथ आपके level पे बात करे | एक क्षण के लिए हम मान लेते हैं | के परमात्मा को,meditation को ईश्वरीय ध्यान को थोड़ा सा अलग रखते हैं | उससे अलग हम व्यवहारिक जीवन में हम सबसे पहली चीज क्या चाहते हैं ? अब तक जो चाहा हमने किसके लिए चाहा ? ultimate जो हमारी demand हैं | वो क्या हैं ? आपको लगेगा एक ऐसे मांंग | एक ऐसे इच्छा वो हैं peace ,शांति ,आंनन्द | एक ऐसा सुख जो सदा मेरे पास रहे | क्यों ? क्या ये मांग हैं या नही?सोचो  निश्चित आप स्वीकारेंगे के मांग तो हैं ही हमारी और जब ये मांग हैं ,ये मांग सबसे पहली और सबसे बढ़ी मांग हैं और सबकी हैं | जब ये मांग हैं शांति की तो दूसरी बात मानसिक शांति का कोई विक्लप हैं ही नही |

peace of mind,eternal peace ,eternal bliss ,permanent peace उसका there is no other alternate| कोई alternate नही इसके बिना | वो मिलेगी ही यही | संसार आपको देगा लकिन क्या देगा physical pleasures ,और those pleasures are thought of livings ,for a short time वो क्षणिक होंगे आने जाने वाले ,coming and going  ,ये उनकी nature में होगा | तो वहा से वही मिलेगा लेकिन permanent peace तो permanent से ही मिलेगी | जब आप permanent  existence that is law that is God  जब उसमे आप  का  मन लगायेगा आपको बिलकुल सहज स्वाभाविक शांति मिलेगी और वो शांति ऐसी होगी जो अंदर ही अंदर eternal peace ,internal peace दोनों end of same things | शाश्वत शांति अपने आप अंदर जब आप connection जोड़ेंगे तो आप इसीलिए समझे ये जीवन के पहली आवश्यकता क्यों हैं ?क्युकी इसी से हमे मानसिक शांति मिलेगी | इसी से हमे ऊर्जा मिलेगी | तो इसलिए इसे formality  नही माने ये, इसे आप जीवन के सबसे पहली आवश्यकता माने | और जब आप ऐसा मान लेंगे तो विश्वास करे के मन लगना शुरू हो जायेगा | गाड़ी बिलकुल सहज ट्रैक पे आनी शुरू हो जायेगी | 

Saturday, 28 November 2015

गीता सत्संग-15

एक बार पुनः सबको जय श्री कृष्ण ..!!!
आओ फिर चले जीवन के सुखद यात्रा में ओर आगे जीवन की बात जीवन के लिए | अच्छे जीवन के लिए सुखद जीवन के लिए | जो बात चल रही थी वो प्रातः काल के नियम की क्युकी हमे इन दिनों जिस चर्चा को विशेष रूप से लेना हैं वो हैं जीवन की दिन चर्या आँख खुलने से प्रारम्भ हो कर अभी हम पहुंचे हैं स्नान इत्यादि के बाद प्रातः काल का नियम पूजा ,पाठ मंत्र जाप और विशेष रूप से ध्यान और उसमे भी जो चर्चा एक practical problem के रूप में व्यवाहरिक समस्या के रूप में सामने आयी आप सबके जीवन और practical reference व्यवाहरिक सन्दर्भ को देखते हुए वो थी मन न लगने की कई बार ऐसा होता हैं कुछ लोग एक दिन,दो दिन चार दिन बैठेंगे जब देखंगे मन नही लग रहा तो ये सोच कर छोड़ देंगे नियम | की क्या करे मन तो लगता नही हैं | यहा आप एक मिनट के लिए विचारे के बच्चा यदि स्कूल दो दिन जाये फिर कहे की मेरा मन नही लगता में नही जाऊंगा i don't want go to school | तो क्या आप उसे ये कहोगे ठीक हैं नही मन लगता तो घर बैठ जा | शायद नही , आप उसे यही कहोगे की स्कूल तो जाना हैं | स्कूल जब जायेगा क्लास में बैठेगा तो धीरे धीरे पढाई समझ आएगी  मन भी लगेग़ा और अगर स्कूल जायेगा ही नही तो आगे का जो step हैं आगे जो stage हैं वो कैसे achieve होगी पढ़ाई के रूप में | बिलकुल यही स्थिति मन की हैं | in reality mind is a innocent child | मन एक अबोध बच्चे की तरह ही हैं | मन शुरू में कहेगा के नही कुछ मिल रहा नही कुछ हो रहा | और छोड़ने चाहेगा ध्यान को और आप भी सोच लोगे मन नही लग रहा तो छोड़ दे |

आज से इस बात को ध्यान में रखे याद रखना के बच्चे  को अगर पढ़ना हैं तो पहले उसे नियम से स्कूल से जाना सीखना होगा | यदि हम चाहते हैं के लाभ मिले ध्यान का , भजन का,पाठ का तो हमे नियम से बैठना शुरू करना होगा | नियम से बैठे आप एक समय निश्चित करे भले ही थोड़ाin beginning small time ,थोड़ा समय ही आप start करे और बैठे पक्का करे रोज बैठना हैं जैसे आप अपने office  में या अपने business  में ,अपनी shop  में आप 8 घंटे कम से कम बैठते हैं न, सोचो बैठते हैं ,जब हम नींद में जाते हैं 6 घंटे कम से कम कुछ लोग कुछ अधिक कुछ लोग कम विश्राम के लिए जाते हैं न, तो ऐसे ही कुछ समय भी निकालो इतना समय तो मुझे बैठना है और ये समय जो होगा ये ,ये भी निश्चित समझो की ये समय कोई भगवान पर अहसान नही होगा | जो हम उसके लिए बैठंगे ये उस पर कोई अहसान नही हैं | ये समय तो अपने लिए हैं | ये तो अपने आनंद के लिए हैं |ये तो अपने कल्याण के लिए हैं | अपनी betterment के लिए हैं,अपनी energy की लिए हैं | ये समय तो मेरे अपने लोक और परलोक दोनों के सुधार के लिए हैं और मुझे अच्छा  हैं | औरो के लिए भी समय निकाले | लेकिन अपने जीवन को भी तो देखना चाहिए ना | जैसे कोई बार हमने देखा पढाई में जब exam होते थे question papers आते थे उसमे लिखा होता था  के attempt any 5 questions ,कोई पांच प्रशन  करो लेकिन साथ ही प्राय लिखा होता था but first is compulsory  | पहला प्रशन अनिवार्य हैं  |हमे ऐसा ही लगता हैं और आपसे कह भी रहे हैं के जीवन में और भी काम करो जो जो निश्चित हैं वो सब अपने अपने काम ढंग़ से करो ,अच्छे  ढंग से करो लेकिन but its a necessary subject of a life, necessity of a life   ,ये जीवन का अनिवार्य विषय हैं | ये तो करना ही हैं | formality  नही हो , जीवन की अवशयता हैं | 

Friday, 27 November 2015

गीता सत्संग-14

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!
आप देखोगे जहा भगवान राम की बात आयी रामो विग्रहवान धर्मः कहा गया | राम क्या हैं साक्षात धर्म |यतो कृष्णः ततो धर्मः जहा कृष्ण हैं वही धर्म हैं  ऐसा संकेत किया गया | 
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
जहा कृष्ण हैं वह नियति  हैं ,अटल नियति हैं,वहा सत्य हैं | वहा श्री हैं | वहा विजय हैं यही तो धर्म हैं | धर्म और हैं क्या नियति ,सद्गुण,सदभाव ये सब धर्म हैं | और इसलिए ये संकेत आओ प्रातः काल से धर्म को साथ ले प्रारम्भ से ,आज का ये विशेष संकेत प्रातः काल जब आँख खुले एक क्षण के लिए मौन बैठे | एक बार आँख खुले फिर एक बार आँख बंद करले |जहा उठे हैं ,जैसे उठे हैं उसी अवस्था में सहज बैठ कर के ईश्वरीय कृपा का धन्यवाद करे | मेरे नाथ आँख भी खुली हैं तो तेरी कृपा से खुली हैं एक क्षण के लिए आप इसी समय मौन हो आँख बंद करे विचार करे की क्या ये सच्चाई नही हैं आपको लगेगा निश्चित लगेगा की आँख खुली हैं तो उसकी कृपा से खुली हैं | 

सो गये कहा पता था किस करवट में कहा हैं | संसार कहा नींद की अवस्था में कौन जानता था ? परिवार कहा sound sleep  में कहा ध्यान था व्यापर ,व्यवहार सब अलग थे गहन निद्रा में, अपने शरीर का भी तो आभास नही था | where is world  ,worldly things ,beings,relations even around body | हमारा शरीर भी हमे कहा ध्यान था ? आँख खुली हैं उसकी कृपा से यही से धर्म का प्रारम्भ यही से दिन चर्या का प्रारम्भ ,परमात्मा की प्रति कृतज्ञता की भावना के साथ दिन का प्रारम्भ | हे नाथ ! आँख भी खुली हैं तो तेरी कृपा से खुली हैं अपनी कृपा बनाये रखना | विश्वास करे यदि आप ऐसा नित्य प्रति करेंगे ईश्वरीय कृपा के दृष्टि का अपने आप लाभ मिलेगा | एक सहज भाव होता हैं जब हम उठते हैं | बड़ा शुद्ध शांत समय होता हैं जब हम उठते हैं | वातावरण में सात्विकता होती हैं उस समय में सहज शांति होती जब उठे ही जब हमारा ध्यान उधर जायेगा तो भगवान का ध्यान हमारी और खिंचेगा के ये जीव उठते ही मेरा ध्यान कर रहा हैं | मेरी ओर इसका ध्यान गया हैं | भगवान के सहज कृपा का लाभ मिलेगा धर्म जीवन में प्रवेश करना प्रारम्भ हो जायेगा | यही से religion will get entry in our life ,धर्म का प्रवेश हो जायेगा |   

और फिर वही बात इस सबके साथ साथ ध्यान meditation  आवशयक हैं उसी क्षण भी उसी भाव के साथ ध्यान लग रहा हैं तो कोई बात नही आप ध्यान लगाये मौन बैठ जाये कुछ क्षणों के लिये और मौन वृति को जोड़े यद्यपि ध्यान स्नान करके सजग करके किया जाये अच्छा हैं ,आवशयक हैं | हा,उसमे कारण ये हैं वैसे तो  आप कभी ध्यान में बैठे, कैसे बैठे उसका लाभ हैं | लेकिन फिर कही प्रमाद,आलस्य फिर हावी ना हो जाये इसीलिए स्नान करे और स्नान करके पूर्ण जागरूकता हो सके तो कुछ क्षण प्राणायाम करे कुछ शारीरिक आसन करके जागरूकता लाये शरीर को सजग बनाये सक्रीय बनाये और फिर मानसिक दृढ़ता के साथ आराम से बैठे बाहर का संसार बाहर  सब कुछ भूल जाये  ,निश्चिन्त पूरी तरह care free जिसके ध्यान में बैठे  हैं चिंता वो करेगा करता हैं, करेगा उसी पर छोड़े निश्चिन्त बैठे अंदर से अपने आप खाली करे भीतर का विश्वास जगाये ये समय केवल और केवल मेरा और मेरे जीवन के आनंद के लिये हैं ढृढ़ निश्चय जगाएंगे when you have firm faith determination | आगे के स्थिति अपने आप आसान होती जाएगी ढृढ़ निश्चय बना के बैठे शांत बैठे | विश्वास   जगाये,निश्चय बनाये की मुझे अपने जीवन के आगे ये आदर्श बनाना हैं जीना हैं  मौज से जी | आगे के बात फिर आगे आज इसी पर विचार करे जो सूत्र मिला हैं प्रेणना मिली हैं| इसे श्री कृष्ण कृपा मान कर विचार करे स्वीकार करे ओम ओम ओम.....!!!!!   
गीता सत्संग वीडियो-14- (वीडियो-लिंक)

Thursday, 26 November 2015

गीता सत्संग-13

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!
आप सब के साथ कुछ जीवन के और आगे के तत्व महत्व पर विचार | इस इशारे के साथ की आप शांत रहे अपने आपको यही रखे जो कहा जा रहा हैं उसे सुने | शरीर से आप यहाँ हैं ,देख रहे हैं ,सुन रहे हैं अच्छी बात लेकिन मन से यहाँ रहे आवश्यक बात, जरुरी हैं | मन से आप यहाँ नही होंगे कही और होंगे तो शरीर से यहाँ होते हुए भी सच पूछो तो आप यहाँ नही होंगे | सिद्धांत यही कहता हैं | मनोविज्ञान psychology ये स्पष्ट करती हैं | के we are not there where  our body,we are where there our mind is | हम वहा नही हैं जहा हमारा मन हैं ,हम वहा हैं जहा हमारा मन हैं | वास्तविकता भी तो यही हैं की जीवन ही नही अगर अच्छे  ढंग़ से जिया जा रहा तो फिर ये संसार ,संसार का व्यवहार ,संसार का सौन्दर्य इसकी उपयोगिता कहा और क्या ? जीवन को जिये, जीना हैं मौज से जिये ..!!!!

फिर से कुछ विचार करे मौज से जीने की कुछ ढंग़ आओ जीना सीखे ..!!! let us know how we leave | जीवन जीने का ढंग़ बाहर का संसार अच्छा हैं | धन कमाये आवशयक हैं | व्यवहार करे वो भी निश्चित जरुरी हैं | लेकिन एक विशेष संकेत आज सब की लिये की बाहर  की दौड़ में आँखे बंध न करले | बाहर की दौड़ में आँखे खुली रखे आप खुली आँखों से | जिसे कहा जाता हैं अंधी दौड़  उसमे शामिल ना हो | भागना बुरा नही ,आगे बढ़ना बुरा नही ,विकास करना बुरा नही | Development बुरी नही जीवन में वो सब अच्छी हैं ,आवशयक हैं करे |

भगवान आप सब को शक्ति दे बल दे आप सब पर कृपा करे ,की जीवन को आप सब अच्छे से जी सके ,जीवन को अच्छी तरह से समझ सके  और साथ साथ बाहर की दौड़ में भी उसमे भी पिछड़े नही ऐसी भी प्रभु आप सब पर कृपा करे | धन जीवन जीने के लिए आवशयक हैं इस बात से कोई असहमति नही | बिलकुल सहमत हैं इस बात से, शारीरिक अव्यशकताओ  के लिए ,परिवार के जिम्मेवारिया पूरी करे के लिए | धन कमाये बुरा नही लेकिन धन के साथ साथ धर्म अवशय कमाए | हमारे ऋषियों ने हमारी सांस्कृतिक  परम्पराओ में धन के महत्व से इंकार नही किया लेकिन ये अवश्य कहा हैं धर्म,अर्थ ,काम और मोक्ष  | जीवन के ये चार पड़ाव समझे ,आदर्श समझे जीवन जीने का एक ढंग़ समझे | धर्म साथ रहे, धर्म आगे रहे और धर्म का तत्व क्या हैं ?

धर्म कोई ऐसी स्थिति नही के जीवन से अलग कोई वेश विशेष के रूप में या कही कोई स्थान विशेष के रूप में या कही कोई मंदिर,गुरुद्वारा कोई कही विशेष स्थानो तक सिमटा हुआ | सब धर्म स्थान अच्छे  हैं | लेकिन आप धर्म ये माने धर्म जीवन का एक अंग हैं ,धर्म जीवन की एक सुंदरता हैं | धर्म  जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने का एक ढंग हैं | धर्म क्या हैं way of life , जीने के पद्धति का नाम धर्म हैं | जीवन जीने के ढंग़ का नाम धर्म हैं और इसलिए गीता प्रारम्भ ही  होती हैं धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे , भगवानकहते हैं ऐ मानव ! तू अपने कर्म को धर्म बना | make your field of action righteous | अपने प्रत्येक क्रिया के साथ धर्म को जोड़ता चला जा | अपने प्रत्येक क्रिया को धर्ममय बनता चला जा |

आओ शुरुवात करे प्रारम्भ करे के कैसे धर्म जीवन का अंग बने | बहुत सरल विषय हैं | आप सबसे ये बात हम विशेष रूप से कहदे के किसी भी तरह से आप इसे मुश्किल ना समझे ,किसी भी तरह से आप इसे आप अपनी पहुंच से बाहर ना समझे | it is not beyond your reach,within your reach,you can do this,easily you do this | |आप आसानी से ऐसा कर सकते हैं | आप ऐसा विश्वास रखे धर्म को आप जीवन में लेकर चल सकते हैं | बहुत बार हम ऐसा मान  लेते हैं के धर्म और आज का जीवन दोनों में जब देखते हैं तो हमे लगता हैं के आज तो  बिल्कुल भौतिकवादिता का जीवन पूरी तरह से materialism में रचा पचा हुआ जीवन ,रमा हुआ जीवन | कभी कभी ऐसा भी लगता हैं के विज्ञानं के इतने ऊंचिया ऐसे ऐसे सुख सुविधाओ के साधन और उसमे  महाराज आप ..!! धर्म की बात करते हो कहा applicable हो सकती हैं | नही सच मानो आज के इस बात को बड़े ध्यान से सुनो समझो | सच मानो जितने आज के इस वैज्ञानिक भौतिकवादी युग में  scientific materialistic age में जितनी धर्म को साथ लेकर चलने के जरूत realize की जा रही हैं,महसूस की जारही हैं शायद पहले नही थी |

क्यूकी धर्म तो उस स्थिति का नाम हैं जो बाहर के materialism में रहते हुए,भौतिकवाद में रहते हुए ,बाहर के इस हरियाली खुशियाली चकाचोंध ,तामझाम में रहते हुए भी जो जीवन को अच्छे ढंग़ से सीखा दे धर्म तो वो हैं और इसलिए ये मत मानो के यदि आप ऐसा मान लेंगे की धर्म हमारी पहुंच से बाहर हैं तो सच में जीवन में बहुत से विकृतिया आती रहेंगी बहुत से vicious ,बहुत से evil जीवन में आने शुरू हो जाएंगे |जीवन में धर्म को साथ रखना बहुत आवशयक हैं |  बहुत आवशयक हैं | और उसकी शुरुवात प्राम्भ से करे प्रातः काल से, दिन के शुरुवात कहा से होती हैं निद्रा के बाद  जब आँख खुलती हैं आओ यही से धर्म को पकड़े आओ यही से हम परमात्मा को साथ ले ,परमात्मा क्या हैं धर्म का सार  तत्व हैं |     
गीता सत्संग वीडियो-12- (वीडियो-लिंक)

Tuesday, 24 November 2015

गीता सत्संग-12

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!
हमारे उपनिषदों ने भी उपयोग से किसी को मना नही किया ,उपयोग तो करना हैं कुछ मिला हैं उपयोग के लिए ही मिला हैं लेकिन "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम्.” त्याग भाव से उपयोग | त्याग भाव क्या उसका मान कर के उपयोग,अपना अहम का त्याग ,अपनी egoistic feeling का त्याग और अपनी Iness और Myness ,मैं और मेरा उस का त्याग करके उपयोग करे | भोगकी परम्परा ये ही इसी विचार के साथ हैं | भगवान के आगे जब रखते हैं हम कृतज्ञता,आस्था तो हैं ही ,विश्वास भी हैं के भगवान भाव के भूखे हैं वो स्वीकार करते हैं कर सकते हैं लेकिन मेरा भाव उस level ऊंचाई के स्तर का हैं  तो,कृतज्ञता तो निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं |

और एक बात और हैं बिलकुल practical life से जुड़ी हुई व्यवहारिक जीवन के साथ जुड़ी हुई वो ये की जब आप इस रूप में करेंगे की भगवान को भोग लगाना हैं ,भगवान के आगे पहले रखकर खाना हैं | तो आप  सोचे बहुत सी समस्याओ  से अपने आप बचाव होने लगेगा | तब अभक्ष्य भक्षण बनाते हुए या  खाते हुए क्या लगेगा नही ?के भगवान को भोग लगाना हैं इस चीज  का? या रसोई में भगवान का भोग बनना हैं तो ये चीज ? तो शुद्धिकरण  रसोई का जिसे हमारे यहाँ अन्नपूर्णा मंदिर कहा जाता हैं | शुद्धिकरण आहार का | purification हमारी feelings की ,हमारे diet की ,हमारे kitchen की अपने आप होने लगेगी | भावो की शुद्धि भी होगी | जब हम ये सोचेंगे की मेरे प्रभु भोग लगाएंगे..!! तो भाव भी हमारे अच्छे  बनेंगे विचारो के feelings में भी अच्छा  भाव आएगा  | हर रूप में लाभ ही लाभ हैं |

और एक बात और भी हैं के जब हम भगवान के आगे रखेंगे | भगवत भाव हमारे भीतर होगा और भगवत भाव जब इधर से उधर भगवान के तरफ मुड़ेगा तो भगवान की कृपा दृष्टि उस पदार्थ में  साथ मिलेगी और इसलिये एक सहज सा भाव आप सब जानते हैं की जब हम भगवान की सामने कुछ रखते हैं तो वो भोजन होता हैं लेकिन जब हम उठाते हैं तो वो भोजन नही होता वो प्रसाद बन जाता हैं ,वो प्रसाद होता हैं | प्रसाद हम उठाते हैं और प्रसाद पाते हैं और ये भी विश्वास रखे हमारी भावना निश्चित रूप से उसे प्रसाद बना सकती हैं | मीरा का भाव भी था जिसने विष को अमृत बनाया था और कुछ भी नही | कोई वह science नही थी | कोई किसी तरह की modern technology नही थी ,नही काम कर रही थी |कोई जादू टोना  नही, कुछ भी नही था | कोई दवा नही थी | क्या था ? मीरा की जो feelings थी उसमे कृष्ण भाव रमा हुआ था |

मीरा ने मान लिया था विश्वास कर लिया था की मेरे लिए मेरे गिरिधर  गोपाल का चरणामृत हैं क्युकी एक बार शब्द कान में पढ़ गया था की राणा ने चरणामृत भेजा हैं और मीरा ने ये विश्वास कर लिया की ये चरणामृत ही हैं मेरे लिए और भाव उस विष को पीते समय मीरा ने विष को अपने चिंतन में नही आने दिया |अपनी feelings में नही विष को आने दिया इसलिये उसकी feeling poisonous नही थी ,विषैली नही थी ,feeling में पूरी तरह से अमृत भरा हुआ था | कौनसा ? उसके नाम का | उसकी कृपा का | उसके भाव का | उसपर विश्वास का | और उसी का परिणाम था मीरा के उस positive feeling ने जो negative poisonous feeling थी उसे दबाया ,समाप्त किया और विष भी अमृत बना |

तो आप विचार करे के जब मीरा विष को अमृत बना सकती हैं केवल भगवत भाव बना कर उसका चरणामृत मानकर | तो हम भोजन को क्यों नही प्रसाद बना सकते ? बना सकते हैं | बन सकता हैं और इसलिये ये संकेत हैं लाभ ही लाभ हैं इसके | no harm at all | no side effects at all | कोई भी side effect नही | नुकसान का तो कोई प्रशन नही |

 इसीलिए खाने से पहले एक भगवत भाव हो | और मानलो आप इतना आप नही भी कर पाते तो ये भाव तो आप बना ही ले जब खाने लगे एक बार भगवान का स्मरण करले और स्मरण करके मन ही मन अपने प्रभु से कह दे यदि कोई मंत्र आता हैं |
ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।जस्वि नावधीतमस्तुमा विद्विषावहै। 
या 
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌ ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||
यदि आप कर पाये उच्चारण well and good ,बहुत अच्छा | मानलो नही कर पाते तो एक सहज feeling बनले , भाव बनाले | मेरे नाथ तेरा दिया हुआ प्रसाद हैं पा रहा हूँ | बस इतना सा भाव बनाये उसके बाद कुछ खाए कुछ मुँह में डाले | पहले उसका स्मरण | बात चल रही जीवन की, जीवन के लिए  ,जीवन के साथ जीवन को अच्छे ढंग़ से कैसे जिये ? और उसी में आज का ये एक विशेष  विचार के खाने से पहले उसका स्मरण उसके प्रति अर्पण का भाव ,उसके प्रति  कृतज्ञता का भाव | जिसे हमरी आस्था ने भोग लगाने का शब्द दिया | आप अपने भाव के अनुसार उसे कर सकते हैं |

 हर क्रिया के साथ भगवत भाव | गीता का वह श्लोक वह भाव स्मरण रहे मामनुस्वर युद्ध च ,मेरा स्मरण  करता रह और जीवन के व्यवहार में लगा रह और स्मरण में ये तो नित्य प्रति ही|और  सब क्रियाएँ साथ साथ होंगी और भगवत भाव चलेगा लेकिन  ध्यान प्रातः काल का नियम | बीच में जब अवसर मिले कुछ क्षण ध्यान का अभ्यास फिर से करले | एक बार फिर से अपनी वृतियों को meditative बनाये | ध्यान के अभ्यास में जोड़े एकाग्र करे और आये कुछ क्षणों के लिए भगवत भाव में stability ,स्थिति, एकग्रता ,complete concentration, और अनुभव करे ,देखे  उस एकग्रता का जब हम उसके भाव में एकाग्र करते हैं कैसी शांति कैसा आनंद ,कैसी ऊर्जा ,कैसी दिव्यता ,कैसी divinity,energy ,peace ,bliss everything you will realize in your inner self  ,ध्यान के क्षणों में आओ कुछ क्षण इस भाव में  ,आगे के बात फिर और आगे जीवन के बात जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने के लिए जीवन के हर पहलू को स्पर्श करते हुए शुभ कामनाओ के साथ जय श्री कृष्ण..!!

गीता सत्संग वीडियो-12- (वीडियो-लिंक)

Monday, 23 November 2015

गीता सत्संग-11

श्री राधा कृष्णा भ्याम् नमः,
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!!!

जीवन की बात को लेकर एक बार फिर आप सबको जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे..!!!

जीवन महत्व पूर्ण हैं लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण हैं " जीवन को जीने का ढंग़ " | जीवन को हम अच्छे  से जी पाये,ये वास्तविकता में महत्व पूर्ण हैं और उसी के लिए एक दिनचर्या ,daily routine प्रातः कल आँख खुलने से पहले ,रात्रि सोने तक हम दिन के व्यवहार को,दिन की क्रियाओ को कैसे आगे बढ़ाये ? उसी पर कुछ बात की जा रही हैं | प्रातः कल का ध्यान meditation हमारी चर्चा का विषय रहा और उसके अनेक पक्ष,अनेक पहलू हमने विचार किये  की ध्यान क्यों ? क्यों परमात्मा का भजन ? क्यों प्रातः कल उठकर नियम ? कैसे करे ? क्या क्या उसमे बाधाए हैं ? उसमे बाधाए हैं ?obstacles हैं ? और उसे हम कैसे handle करे ? उसका कैसे हल निकाले ? उस पर विचार किया गया...!!!

अब आगे आओ थोड़ा और आगे बढे जीवन की बात के साथ | ध्यान की पश्चात कुछ स्वाभाविक हैं कुछ खाने पीने की बात | उसमे एक बात एक तो सात्विक आहार , normal diet ,सात्विक रूप में खाये | अच्छा खाये स्वास्थ्य वर्धक खाये | वो न खाये जो खा सके,वो खाये जो पचा सके | उतना न खाये जितना खा सके ,उतना खाये जितना पचा सके ये आयुर्वेद का एक सिद्धांत हैं | 

और खाने में भी सात्विकता भी रहे और साथ साथ ये भी ध्यान रहे  की अभक्ष्य भक्षण बिलकुल भी नही | एक परम्परा जो हमारे धर्म में विशेष रूप से मान्य हैं और प्रेरणा के रूप में बार बार कही भी जाती हैं की  भगवान को भोग लगाना | बहुत से लोगो को लगता हैं की ये परम्परा एक blind faith ,केवल एक अन्धविश्वास परम्परा हैं जिसका कोई meaning आज की इस scientific age में, वैज्ञानिक युग में और आज की इस advanced technology के युग में ,जबके इंसान  इतनी ऊँची उड़ान की बात कर रहा हैं | इतनी नए नए संधान ,नए नए अविष्कार ,नए नए वस्तुएॅ यहाँ तक पहुंचा हैं | तो ऐसे समय में भगवान को भोग की बात करना कहीं कहीं कुछ एक को लगता हैं की ये just meaningless बात हैं ,कोई अर्थ इसका नही बैठता लेकिन नही, हम आपको आज स्पष्ट करना चाहँगे ,बताना चाहँगे ..!!

की हमारी परम्परा जो हैं ये आस्था,श्रद्धा और भाव की परम्परा तो हैं ही लेकिन साथ साथ बहुत उपयोगी ,बहुत useful fruitful tradition हैं | बहुत अच्छी  परम्परा हैं और बड़ी वैचारिक बड़ी,वैज्ञानिक ,बहुत प्रकार से अनेक लाभ देने वाली परम्परा हैं ये भोग लगाने की परम्परा | जो लोग ये सोचते हैं की भगवान कहा खाते हैं ,ये तो केवल एक blind faith की बात हैं की भगवान खाते हैं | भगवान खाते हैं वो तो लेकिन blind faith नही ये  भाव की बात हैं | भाव हैं तो निश्चित रूप से भगवान स्वीकारते हैं ये आप विश्वास रखे क्युकी हमारे भगवान केवल और केवल एक ही बात के पक्षधर हैं ,एक ही भाव के ,एक ही बात के भूखे कहो या इछुक कहो| कोई भी शब्द लगाओ वो हैं प्रेम, वो हैं भाव ...!! 

सत्य हैं वो सब को खिलाता हैं उसके यहाँ कोई कमी नही ,ये सत्य हैं के सब कुछ उसी का दिया हुआ हैं | और उसी के ही दी हुई वस्तु उसी के आगे रखना ,उसे के अर्पण करना कोई बहुत बुद्धिमता के बात नही दिखती |लेकिन इसमे भी हमारा एक तर्क हैं के हमारी कृतज्ञता के भावना हैं इसके पीछे जो feeling of gratitude हैं , कृतज्ञता का भाव हैं उसको आप समझे | पुत्र कुछ कमाता हैं और  कमा कर के अगर वो पहली कमाई आते ही अपने पिता के हाथ में  रखता हैं के अपकी कृपा,आपके आशीर्वाद से मैं  इस योग्य हुआ हू | आपका दिया हुआ हैं आपके अर्पण हैं तो आप इस level पर विचार करे के पिता वो कितना प्रसन्न होगा पुत्र के इस कृतज्ञता के भाव से भले ही वो उसकी कमाई पुत्र को लोटा दे लेकिन आप इस feeling को समझे कितनी प्रसन्नता होगी पिता को|इस भाव से सच माने, विश्वास  करे जब हम भगवान के दी हुई वस्तु उपयोग से, पहले प्रयोग से पहले भगवान के अर्पण करते हैं तो निश्चित समझे भगवान को भी वैसे ही उससे भी अधिक प्रसन्नता होती हैं के ये जीव कृतज्ञ हैं कृतघ्न नही | इस जीव को याद हैं स्मरण हैं उस स्मरण के साथ वस्तु का प्रयोग कर रहा हैं |
    गीता सत्संग वीडियो-११-(वीडियो-लिंक)

गीता सत्संग-10

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे ..!!!
अच्छा ये बताओ क्या आप नही चाहोगे ऐसा जीवन ? एक मिनट के लिए सब विचार करे क्या आप ऐसा जीवन नही चाहेंगे के जहा उत्साह हो ,जहा आशावादी भाव हो ,जहा एक विश्वास हो,जहा सहज स्वाभाविक  आनंद हो,जहा जीवन के मजबूती  हो | क्या नही चाहोगे ऐसा ? विचारे, आप सहमत होंगे,हो रहे होंगे के सच में जीवन तो हम ऐसा ही चाहते हैं | आओ, जीवन की बात जो चल रही हैं, अच्छे जीवन के लिए उसे आप समझे और उसके हर बात के साथ अपने मन के भाव मिलाते हुए इसे जीवन में स्वीकार करते चले जाये | भजन के ,ध्यान के महत्व को समझे स्वीकारे समय अपने आप निकलेगा | जहा से बात start की गयी ,प्रारम्भ की गयी एक बार फिर ध्यान दे ले समय नही मिलता,मन नही लगता इन दोनों problems का सीधा सा solution,समाधान importance समझो |निश्चित करो, के ये  मेरे अच्छे जीवन के लिए ,आनंदमय जीवन के लिए ,उत्साह पूर्ण जीवन के लिए ,एक मात्र विकल्प ,एक मात्र आधार ध्यान हैं ,भजन हैं ,उसको साथ रखे ,मन में इसे स्वीकार करे समय भी निकलेगा और जो मन के लगने के जो प्रक्रिया हैं, जो process हैं ,मन को जो concentrate करने का वो भी अपने आप शुरू हो जायेगा | आगे  मन कैसे लगेगा उस पर फिर और चर्चा कर लेंगे लकिन आज इस बात को स्वीकारे और इस पर विचार करते रहे और इसे जीवन में  स्वीकार करते रहे | ओम ओम ओम..!!सबके लिए शुभ कामनाओ के साथ जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे 

Saturday, 21 November 2015

गीता सत्संग-9

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे ..!!!
आज कल के जो educated society हैं ,पढ़ा लिखा वर्ग हैं उसे आज कल के ढंग़ से ही समझाया जायेगा तो बात ठीक और जल्दी समझ में आपायेगी | इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं की रोज प्रातः काल ,daily in the morning आप को आवश्यकता महसूस होती हैं mobile को charge करने की क्यों ? आपको लगता हैं ऐसा की घर से बाहर जायेंगे पूरा दिन मोबाइल से काम लेना हैं | एक बार morning में अच्छी तरह charge हो जाये ,fully charged और उसके बाद उससे पूरा दिन काम ,बिलकुल similar is the stage here ,बिलकुल ऐसी स्थिति यहा हैं | 

morning में जो ध्यान हैं उसे आप आज के reference में ,आज के सन्दर्भ में आज की परिस्थितियो में उसे आप मन की charging समझे | mobile को power के साथ connect किया जाता हैं ,वो charge होता हैं | ऐसे ही जब हम अपने मन को connect करते हैं परमात्मा से और परमात्मा क्या हैं? Power of Powers,He is Supreme Power,He is Almighty Power, सर्वोच्च सत्ता हैं,शक्ति हैं |Supreme शक्ति हैं वो परात्मा | 

और जब हम अपने मन को वहा जोड़ते हैं,अपने मन की तार ,ध्यान में करना क्या हैं ? की यही अपने मन का connection  जोड़ना हैं | जब हम यह कहते हैं की सीधा बैठे और सीधा बैठ कर के अपने अंदर देखे अपने अशांत मन को जो wavering  हैं | उसको अंदर ही अंदर जोड़े,connect करे परमात्मा से और ये जो point हैं जहा हम तिलक करते हैं दोनों भ्रुवो के बीच .eyebrows का center point,यहा आज्ञाचक्र | यहा हम अंदर ही अंदर अपने को connect करे | इसे आप ऐसे समझे जैसे घर में electric points हैं लेकिन जहा plugging करते हैं charging के लिए या किसी भी electric equipment के functioning के लिए,उपकरण को काम में लाने  के लिए जैसे आप plug जोड़ते हैं socket that's called socket ,ये point जो हैं charging point हैं |

जब हम यहाँ connect करते हैं अपने आपको, तो आपको लगेगा surely and certainly ,निश्चित रूप से ,you will feel ,you will realize | mind is being charged ,मन charge हो रहा हैं |अंदर ही अंदर आपको एक natural energy ,peace मिलेगी निश्चित रूप से आप ऐसा करे | और कोई भी भगवान का नाम या आपका मन्त्र या केवल ॐ इसमे बहुत अच्छा  role निभा सकता हैं | शांत बैठकर अंदर देखे और अंदर ही अंदर या बहुत धीमी आवाज में slow tuning मंत्र जाप और फिर connection | जितनी देर लगे के मन जुड़ा हैं connection मिला हैं |जोड़े रखे ,अंदर अनुभव करते रहे जैसे एक विशेष ऊर्जा अंदर ही अंदर अनुभव हो रही हैं | जब मन कही जाने लगे उसी समय फिर मंत्र,फिर प्रणव ॐ  या कोई नाम, उसके सहारे फिर मन को वहा ले आये | ॐ....!!!


 इस कर्म को चलाये रखे बिलकुल आपको  वैसा ही लगेगा और ये जो भाव हैं दिन भर ये जैसे mobile charge हुआ दिन भर आगे काम आएगा | ऐसे ही आप एक बार अच्छे  ढंग़ से चार्ज हो गया तो दिन में आप कही भी रहेंगे आप का मन जल्दी से नही हिलेगा,unstable नही होगा ,अस्थिर नही होगा | प्रातः कल का नियम ,भजन ,पाठ इसके महत्व के बात हैं के जब आप इतना महत्व देंगे के ये मन के charging  हैं ,ये जीवन के नीव हैं ,ये जीवन का आनंद हैं ,its bliss of life ,its energy of life  ,ये जीवन के ऊर्जा हैं ये जीवन के मजबूती हैं | it makes the mind strong ,life strong..इससे जीवन मजबूत बनेगा,मन मजबूत बनेगा ,इससे memory sharp होगी ,स्मरण शक्ति बढ़ेगी | इससे अंदर confidence,विश्वास बढ़ेगा ,उत्साह बढ़ेगा | you will feel yourself confident,energetic,enthusiastic,उत्साहवादी,आशावादी,hopeful....!!!  


गीता सत्संग वीडियो-9-(वीडियो-लिंक)

गीता सत्संग-8

जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे ..!!!
बात चल रही हैं जीवन की,जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने के लिये दैनिक चर्या की,daily routine | एक बात जिसे हम थोड़ा सा आगे बढ़ाते हैं सभी अपना ध्यान इधर रखे,यही रखे और सुने with concentration एकग्रता से , ये बात ऐसी हैं जो प्रायः कही न कही सबके जीवन में एक problem के रूप में दिखती हैं यद्यपि its not a problem, seems to be,लगता हैं एक problem हैं,कही ये सुनने में आता हैं के समय नही मिलता,we got not a time.

कही बात चल रही थी पीछे daily routine को लेकर के प्रातः काल कुछ समय हम meditate करे ,ध्यान में बैठे तो प्रायः दो बाते इसमें आती हैं | जिसको आज थोड़ा स्पष्ट करते हुए आगे बढे एक बात हैं समय की और एक बात हैं की मन,नही लगता बैठे भी तो लेकिन दोनों बातो को अगर आप ठीक ढंग़ से लेंगे | आपको लगेगा की कोई ऐसी complication नही हैं | जिसका कोई solution,जिसका कोई समाधान ,कोई हल न हो | 

बड़ी स्पष्ट बात ये हैं की जिसकी हम importance बढ़ाते हैं ,या जिसे हम importance देते हैं ,जिसको हम important समझते हैं जीवन में ,उसके लिये समय निकाला नही जाता ,निकलता हैं | आप अपने practical life में देखे ,व्यवाहरिक जीवन में देखे आपको ऐसा लगेगा की जहा भी importance दी जाती हैं वहा के  लिये समय automatically अपने आप निकलता हैं | जिस चीज को importance नही दी जाती वहा के लिये ये बात जरूर रहती हैं की समय नही मिलता और  मन नही लगता | मन की बात जो हैं इसी के साथ मिली हैं,जुड़ी हैं | 

जो बच्चा पढाई की importance समझता हैं और पढाई को जो necessary  importance हैं, जरुरी महत्व हैं पढाई का उसे स्वीकार कर लेता हैं ,मान लेता हैं, समझ लेता हैं | वो बच्चा यह नही कहेगा के मेरा मन नही लगता पढाई में  या  i have no time of study ,मेरे  पास समय नही हैं पढ़ने के लिये ,वो बच्चा नही कहेगा जो बच्चा पढाई के महत्व को नही समझ पाया उसे के साथ ये questions जुड़े होते हैं | जब हम ये समझ लेंगे के, ये मान लेंगे के  meditation,ध्यान ,भजन ,पाठ इसका जीवन में कितना महत्व हैं ,its base of life, foundation of  life | जब हम ये मान लेंगे के ये आधार हैं ,नीव हैं और ये सब जानते हैं मजबूत नीव पर ही अच्छा और पक्का मकान बनता हैं | इस बात को आप बहुत seriously ले मजबूत नीव पर ही अच्छा और  पक्का मकान  बनता हैं | 

अगर आप चाहते हो के जीवन का मकान ,building of life, जीवन हैं,उसे भी हमे build करना हैं ,बनाना हैं |मकान बनाये वो भी अच्छा हैं ,अच्छा मकान बने लेकिन हम अपने जीवन को भी बनाये और वो कैसे बनेगा वही चले मकान बनाने के लिये solid foundation ,मजबूत नींव जीवन के लिये भी बहुत जरुरी हैं | मजबूत नींव एक ऐसा मकान जो तेज़ हवाओ,आंधी यहाँ तक के भूकम्प में भी हिले नही,earthquake उसमें भी हिले नही |

 नींव से ही ध्यान रखना पढ़ेगा एक ऐसा जीवन यदि आप चाहते हैं के जो जल्दी से हिले नही डगमगाये नही, अशांत न हो, विचलित न हो ,परेशान न हो, चिंतित न हो जो मजबूत रहे | solid ,strong,bold ,मजबूत जीवन उसके लिये बहुत जरुरी हैं अच्छी और पक्की नीव और उसके कई उदहारण हैं there are so many examples of it मीरा का जीवन बहुत बड़ी परस्थितयो में क्यों नही हिला नींव मजबूत थी और कैसी ध्यान की, meditation के | 
गीता सत्संग वीडियो-8-(वीडियो-लिंक)


Thursday, 19 November 2015

गीता सत्संग-7

सबको जय श्री कृष्ण...!!!
एक motto ,एक आदर्श वाक्य जो इस चर्चा में रहेगा वो हैं " जीना हैं तो मौज से जिये " मौज से जिये और वो कैसे संभव हैं ? बहुत लोगो को आप में से ऐसा लग सकता हैं की कहना आसान हैं लेकिन संसार की बदलती, बिगड़ती परस्थितियों में मौज से जी पाना ,मौज में रह पाना हैं बहुत कठिन..!! its very difficult,so difficult we can't say,ऐसी बहुत से बाते हैं,आपके मन में ये सुन कर के आसकती हैं,we agreed हम आपकी इन बातो से सहमत हैं ,भारतीय,हिन्दू,सनातन परम्पराओ में बुद्धि  को बहुत महत्व दिया गया हैं ,बुद्धि का निर्णय जैसा होता हैं ,मन के विचार वैसे बनते हैं ,मन वैसाplanning करता हैं ,मन वैसी योजनाये बनता हैं |

और फिर जीवन की गाढ़ी तो उधर चल ही पढ़ती हैं ,सारथि घोड़ो की लगाम जिधर खींचता हैं आप जानते हैं रथ उधर को ही चलता हैं | driver starring को जिधर मोड़ता हैं गाढ़ी उधर को ही चलती हैं | बुद्धि जैसा निर्णय करती हैं,जीवन के गाढ़ी उसी ओर चलने लगती हैं और इसीलिए आज सबसे पहली बात आपसे यही कही जा रही हैं की जीवन को अच्छे ढंग़ से जीने का एक firm decision करे ,ढृढ़ निश्चय करे ,मन बनाये,विचार बनाये की जीवन को मुझे अच्छे ढंग़ से जीना हैं और आपके इस निर्णय में आपको सहयोग करेगा meditation ,ध्यान..|जब आप कुछ क्षण ध्यान का अभ्यास प्रारंभ करेंगे ,तो वो अभ्यास  इसमे आपकी सहयता करेगा ,आपको बल मिलेगा ,आपकी बुद्धि जो हैं found decision करने में अपने आपको सक्षम पायेगी और जब इसमे आपको एकग्रता का लाभ मिलेगा आप पायंगे की जब, जीवन की अच्छे ढंग़ से जीने की एक शुरुवात हैं ,ध्यान जीवन का एक बहुत मजबूत आधार हैं ,ध्यान हमारी आध्यत्मिक शास्त्रीय भाषा में निदध्यासन-meditation ,meditation करे, अवश्य करे, नियम से करे, भले ही आप सिर्फ 5 मिनट से प्रारम्भ करे ,लेकिन ध्यान करे ये विश्वास रखे की ध्यान जीवन का आनंद हैं ,ये विश्वास रखे की ध्यान जीवन की ऊर्जा हैं ,ये विश्वास रखे की ध्यान जीवन का एक बल हैं,एक सम्बल हैं ,एक नीव हैं ,फाउंडेशन हैं,मजबूत,सुंदर,स्वस्थ आनंदमय जीवन,की ध्यान.. !!

ध्यान के लिए आप बिलकुल सहज भाव बनाये और उससे पहले एक बात और कहे ,ध्यान की प्राम्भिक आवश्यकताओं के रूप में जब भी आप ध्यान में बैठे | हल्के वस्त्र पहने ,हल्के वस्त्रो का अभिप्राय मर्यादित लेकिन बहुत ऐसे नही जिससे आप ठीक आसान पर न बैठ सके |ऐसे वस्त्र पहने सहज मर्यादित ,अच्छे ,स्वछ,और फिर एक अच्छे स्थान पर ,शांत बैठे ,एक सहज सा आसान लगाये |जिसपर आप बहुत आराम से बैठ सके कोई हल चल नहीं ,किसी प्रकार की |बहुत आराम से बैठे और बैठकर कर के धीरे से नेत्र बंद करे |दवाब देकर नही,तनाव बनाकर नही,भींच कर नही ,बहुत lightly |अंदर कोई तनाव नही,कोई दवाब नही,इस समय में ये विश्वास बनाये ये समय मेरा अपने लिए हैं,संसार की इस भाग दौड़  में ये निश्चित करले ,की कुछ क्षण मुझे अपने लिए, you yourself will realize energy ,peace ,confidence ,boldness and everything,you will find,you will realize ,you will feel in your inner self...!!

आओ कुछ क्षण ध्यान के लिए निकाले,आगे की बात फिर आगे आज इसी पर विचार करे और जीवन के महत्व को समझे,जीवन के महत्व के साथ-साथ ध्यान की दिव्यताओं में बढ़ने का प्रयास और ये भी निश्चित करले की हमे कुछ मिनट नित्य प्रति,in our daily routine निकालने हैं,ध्यान के लिए,अपने लिए,अपने जीवन के आनंद के लिए | ओम ओम ओम...!!!

गीता सत्संग वीडियो-7-(विडियो लिंक) 

गीता सत्संग-6

सबको जय श्री कृष्ण...!!!
अब आईये थोड़ा इससे आगे बढ़ते हैं जीवन महत्वपूर्ण हैं,बहुत महत्व हैं इसका ,लेकिन इसका लाभ हम कैसे ले ? जीवन को जीये कैसे ? यह भी निश्चित हैं की जीवन जीने के लिए हैं और जीने के लिए भी उस ढंग़ से नही जैसे कोई बहुत पुराना गीत आप लोगो के ध्यान में होगा "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पढ़ेगा ,जीवन हैं अगर जहर तो पीना ही पढ़ेगा" ऐसा कुछ नही जीवन के साथ ,ठीक हैं इस गीत की सामूहिक परिस्थिति रही होगी,और ये गीत उस परिस्थिति में उस ढंग से गाया गया होगा.. अच्छा हैं ,अच्छी  बात हैं लेकिन जीवन की जो वस्तु स्थिति हैं वो जीना पढ़ेगा,जहर पीना पढ़ेगा उससे कुछ अलग हैं ,अतीत हैं, उससे कुछ जब हम चिंतन में लेंगे तो हमे लगेगा की जीवन की कुछ अलग मौज भी हो सकती हैं, जब हम जीने  के ढंग़ को सिख लेंगे,समझ लेंगे,विचार लेंगे..

और अब हम  उसी बात पर आते हैं की जीवन को अच्छे ढंग़ से जिया कैसे जाये ? जीवन मेरे भाई बहन..!! केवल काटने के लिए नही हैं जैसा बहुत लोग आम भाषा में कह देते हैं जब पूछो कैसे हो  बस " कट रहा हैं जीवन " जीवन काटने के लिए नही हैं..जीवन time pass करने के लिए भी नही हैं ,बहुत बार ऐसा भी होता हैं के हम ये भी कह देते हैं के हम तो बस time pass  कर रहे हैं |नही..!! time तो pass हो रहा हैं ...हर बात पे विचार करे ,हमारा ये भी आग्रह आप सब से यहभी जीवन को थोड़ा विचार से जीये ,समय को अपनी गति से निकलना हैं ,समय अपनी गति से निकल रहा हैं ,समय के एक ही गति हैं किसी के रोके रुका नही समय ,किसी के बुलाये,लौटाये लौटा नही समय,ये आप सब जानते हैं, Past can never be recalled ,अतीत को recall नही किया जा सकता ,ये बात भी स्पस्ट हैं के time and tide waits for none..समय और पानी की लहरे जैसे गंगा जी में आप देखते हैं प्रतीक्षा नही करती, रूकती नही ,उनका एक प्रवाह हैं ,एक क्रम हैं,समय चल रहा हैं,time pass हो रहा हैं ,हमने नही करना ,हमने तो समय का सदुपयोग करना हैं ,जो समय का सदुपयोग सिख लेता हैं वो अपने इस जीवन का सदुपयोग कर लेता हैं,  वो मनुष्य जीवन के रूप में मिली हुई इस ईश्वरीय कृपा का भरपूर आनंद ले ले लेता हैं... 

पर ये बात भी आपसे स्पष्ट करदे जीवन आनंद के लिए हैं और आनंद जीवन के लिए हैं ,जीवन में आनंद लिया जा सकता हैं |बहुत बार ऐसी बात भी आती हैं के जीवन काँटों की शैया हैं ,जीवन कंटीला हैं,दुःख पूर्ण हैं |हा..!!हो सकता हैं संसार के परिस्थितियाँ कई बार जीवन को ऐसा बनाने का प्रयास कर सकती हैं ,करती हैं लेकिन फिर भी हम आपसे कहे जीवन आनंद के लिए हैं ,आनद जीवन में लिया जा सकता हैं ,अनुभव किया जा सकता हैं जीवन को एक मौज बनाये ,जीवन को सहज आनंद से जीये और उसमे सबसे पहली बात इस  जीवन के महत्व को समझे जीवन में आपके पास अंदर बहुत कुछ ह ,बहुत कुछ हैं आपके अंदर, सच में आनंद भीतर हैं,ऊर्जा भीतर हैं,शांति भीतर हैं ,सद्गुणों का भंडार भीतर हैं,enlightenment,प्रकाश भीतर हैं ,सब कुछ भीतर हैं थोड़ा सा इस जीवन के महत्व को समझे .... 

एक बात और हैं आश्चर्य होगा आपको ,सम्पदा आपके पास हो ,धन आपके पास हो ,वैभव आपके पास हो,लेकिन पास होते हुए भी  यदि हम भिखारी जैसा जीवन जीये ,कांगलियत का सा जीवन जीये तो आपको कैसा लगेगा के सबकुछ पास और दुसरो को भी कैसा लगेगा ,के सब कुछ होते हुए भी ये कैसा जीवन ?ऐसा क्यों इसीलिए के सब कुछ पास होते हुए भी उसका उपयोग नही कर रहे ,उसे उपयोग में नही लाया जा रहा ,जीवन में जीवन से जब सब कुछ मिल सकता हैं तो क्यों न उसे उपयोग में लाये..!! आओ जीवन को जीना सीखे..!! 
गीता सत्संग वीडियो-6 (विडियो लिंक)

Wednesday, 18 November 2015

गीता सत्संग-5

सबको जय श्री कृष्ण...!!!
मातृ भूमि को नमन,अपनी सनातन वैदिक,धर्म की समस्त परम्पराओ को नमन ...!!!

मनुष्य जीवन की बात करे एक दुर्लभ अवसर हैं अपने आप में यह,सच माने तो ईश्वरीय कृपा का अपने आप में एक अनमोल उपहार हैं ,precious gift of the divine grace ,किसी भी दृष्टि से विचार करे अपने जीवन पर की ये बात बहुत स्पष्ट हैं संसार अच्छा हैं ,सुंदर हैं ,आकर्षक हैं ,संसार में बहुत कुछ हैं लेकिन आज हम  सबसे पहले थोड़ा सा मिल कर इस बात पर विचार करे की संसार की सुंदरता,संसार की उपयोगिता ,संसार की ये आकर्षण ,संसार के पदार्थ ,संसार का वैभव,ये महत्व रखता हैं ,मूलयवान हैं तो किस कारण से ?  जीवन के कारण से ही तो..!!!  

इस बात से तो आप में से कोई भी असहमत नही होगा ..!!! पूरी तरह आप इस बात से सहमत होंगे , agree करेंगे ,convence भी होंगे..की जीवन के कारण  इनका महत्व हैं ,इनके कारण  से जीवन का महत्व नही हैं | जीवन इन सब से महत्वपूर्ण हैं और इसीलिए हमारा शास्त्र ये कहता हैं | हा.. ये बात भी हम स्पष्ट करते चले..की शास्त्र जो कहता हैं वो हमारे हित  के लिए कहता हैं ,हमारी बात कहता हैं कही न कही उस बात के पीछे आप अपने जीवन की बात पाएंगे | शास्त्र जब ये कहता हैं की नाही मनुष्यात श्रेष्ठतरं ही किंचित...!!! मनुष्य जीवन से श्रेष्ठ किंचित भी वस्तु कोई नही हैं ..

तो यहाँ विचार करे क्यों कहा शास्त्र ने ये इसीलिए क्युकी मनुष्य जीवन  के कारण से ही  इन सब वस्तुओ  के,  इस वैभव  के  ,इन मकानो की ,प्रकृति की इस सौंदर्य की ,मनुष्य जीवन के कारण से  ही तो महता हैं | जीवन हैं तो इनकी महता हैं और अगर जीवन ही नही तो इनका महत्व कहा ? और कैसा ? ये बात एक बहुत महत्वपूर्ण हैं-नाही मनुष्यात श्रेष्ठतरं ही किंचित...!!! इस बात को गहन विचार करने की आवश्यकता हैं अब बात आती हैं की जब जीवन इतना महत्वपूर्ण ,जीवन में, जीवन से सब कुछ मिल सकता हैं ,मिलता हैं ,पाया जा सकता हैं लेकिन यह बात भी हम सबको मिल कर विचार करनी हैं 


आज जो हम आपसे कह रहे  हैं ये केवल कोई उपदेश की बात नही हैं ,केवल कोई अतीत की बात नही ,केवल किसी युग की कथा नही,यद्यपि यह भी स्पष्ट करले किसी के मन में कोई शंका न रहे की हमारे शास्त्रो में वर्णित कथाये हैं वो भी कही न कही जीवन की उपयोगियता से जुड़ी हुई हैं लेकिन फिर भी हम जीवन की सीधी बात जीवन के साथ करते हैं ,जीवन की सीधी बात आपसे शेयर कर रहे हैं  और वो बात ये हैं की जीवन में, जीवन से सब कुछ पाया जा सकता हैं लेकिन हमे विश्वास  हैं आप इस पर बहुत गंभीर चिंतन करेंगे की सब कुछ देकर भी ये जीवन नही पाया जा सकता ,जीवन तो क्या.. जीवन का एक स्वांस भी ,पुरे संसार की सम्पदा दाव पर लगाने से नही मिल सकता इसीलिए भी आप विचार करे और इस बात को विचारपूर्वक स्वीकार करे की जीवन बहुत महत्वपूर्ण हैं ...बहुत महत्वपूर्ण ..
गीता सत्संग वीडियो-5 (विडियो लिंक) 

Tuesday, 17 November 2015

गीता सत्संग-4



सबको जय श्री कृष्ण...!!!
ध्यान में आँख बंद करके उसे अनुभव करना हैं,उसमे वृति जोड़नी हैं तो यदि कृपा के भाव में वृति रमे गी, जमे गी,तो खुली आँखों में भी एक आपको समाधि का सा.और कभी कभी सहज आनंद ध्यान का आनंद मिलेगा और यदि उस भाव को लेकर आप कभी आँख बंद करके बैठोगे और केवल कृपा का स्मरण करते करते बैठोगे ,कृपा का भाव बनाये बनाये बैठोगे ध्यान में बिलकुल सीधे ,सजग ,आँख बंद करके और उसकी कृपा का स्मरण करते हुए ,अंदर से लेकर बाहर प्रकृति तक ,अंदर के अपने सिस्टम से लेकर ,ह्रदय के धड़कन में उसकी कृपा देखो 


जो लोग कहते हैं ध्यान में मन नही लगता,आँख बंद करे और हृद्धय धड़क रहा हैं ,ह्रदय के धड़कन ,heart palpitation जो हैं उसमे उसे देखे की तेरी कृपा हैं ,स्वांस चल रहे हैं ,उसमे उसे देखे ये तेरी कृपा ,blood circulation हजारो हजारो नाड़ियो में लगातार हो रहा हैं एक feeling  बनाये बहुत delicious feeling ,बहुत blissful feeling हैं ये, feeling बनाये की तेरी कृपा ही प्रत्येक नाड़ी में blood circulation क़े रूप में चल रही हैं,भोजन करने क़े बाद digestion  ये कृपा नही तो और क्या हैं ? कुछ भी खाए और लाल रंग का ख़ून blood cells जो अंदर हैं वो कृपा क़े अतिरिकित क्या हैं सोचे और ऐसा ही कृपा का भाव बनाये रख कर क़े ,कुछ ऐसा अंदर से अहसास करे..



"तू स्वांसो क़े हर तार में रम रहा हैं तू धड़कन क़े हर साज में बज रहा हैं ,कभी भूलकर भी न तुम को भुलाओ हे नाथ नारायण वासुदेवाय" इसी भाव में कुछ समय ध्यान में एकाग्रता,concentration करे अपने आपको ,connect करे अपने आपको उस divine base में,उस divine consciousness में और उसमे कुछ मिनट अपने आपको पूरी तरह से समाहित रखे कोई और भाव नही कृपा,कृपा ,कृपा...!!!ओम,ओम,ओम...!!!

गीता सत्संग वीडियो-4 (विडियो लिंक) 

Sunday, 15 November 2015

गीता सत्संग-3



सबको जय श्री कृष्ण...!!!
मीरा का विष अमृत बना वो केवल इसीलिए पूर्व में हमने भगवान को भोग के भाव की बात में ये संकेत किया था केवल इसीलिए की प्रतिकूलता में मीरा गभराई नही,डगमगाई नही उस समय भी मीरा का ध्यान गोबिंद में रहा,मीरा का ध्यान उसके भाव में रहा,मीरा ने अपने मन की वृितियो को उसमे जोड़ कर के रखा ,उस समय भी जब पूरी तरह negatives ही negatives,against ही against था सब कुछ ,तब भी मीरा कृष्ण भाव में थी और उसका परिणाम क्या हुआ,परिणाम वही की वहां विष के पियाले में गोबिंद,विष की पियाले में श्याम सुन्दर | 


आओ...!!! प्रयास करे कुछ ऐसा जीवन बनाने का ,कुछ इस ढंग़ से जीवन को जीने का जहा एक balanced स्थिति बने,जहा कुछ प्रतिकूलता हैं उसमे भी हम उसका भाव लेके जीये,कृपा देखे,हर ओर कृपा देखे,प्रकृति  हैं ये उसकी कृपा हैं ,ये खिले हुए मुस्कुराते फूल हैं ये उसकी कृपा हैं ,लहलहाती प्रकृति हैं ये उसकी कृपा हैं ,पूरा संसार ये उसकी कृपा ही हैं,कुछ भी हमारे पास हैं ये उसकी कृपा हैं, और तो और ये जीवन भी हैं तो ये भी उसकी कृपा हैं ,ऐसा मानकर कर के चले..

और एक संकेत हमने किया था के कृपा जिसे देखनी हैं वो तो आँख खुलेगी तो भी उसकी कृपा का अनुभव कर लेगा,तो भी उसकी कृपा का अनुभव कर लेगा...!!! positive रहे ,सकारात्मक रहे,उसकी कृपा के भाव में रहे और एक बड़ा सीधा सा चिंतन हैं -As You Think So You Become ,जैसा सोचते जाओगे वैसा बनते चले जाओगे ..बिलकुल ये एक scientific fact है ये,scientific ,वैज्ञानिक सत्य,आध्यात्मिक सत्य तो हैं ही हैं,ये religious fact, spiritual fact तो हैं ही हैं ,लेकिन scientific fact भी हैं , universal fact के रूप में हैं ये-As You Think So You Become ....


जैसा सोचोगे वैसे बनोगे,जब negative ही negative सोचते रहोगे तो मन वैसा ढलता चले जायेगा और जब positive और विशेष रूप से positive में भी उसकी कृपा को सोचोगे तो कृपा को सोचते सोचते,कृपा का भाव लगातार बनाये रखते हुए,बनाये रखते हुए निश्चित समझो की आपको उसकी कृपा का अनुभव होता रहेगा और उस कृपा के अनुभव में तो आप का खुली आँखों में भी ध्यान होगा,खुली आँखों में भी ,क्युकी वही देखेगा.....!!!! 

गीता सत्संग वीडियो-3 (विडियो लिंक) 


Friday, 13 November 2015

गीता सत्संग-2


सबको जय श्री कृष्ण...!!!
आप देखते ही हैं के माँ प्यार भी देती हैं ...कभी कभी माँ थोड़ा डांट भी सकती हैं और डांट भी देती हैं..!!! हैं तो बच्चे का दोनों में लाभ ही ना, माँ अगर बच्चे को प्यार भी देती हैं तो भी उसमे बच्चे का लाभ हैं | और माँ यदि बच्चे को कभी कोई डांटती हैं ,कोई तीखा शब्द भी कहती हैं, वो भी बच्चे का अहित माँ तो नही चाहेगी ना,बच्चे का बुरा माँ तो नही चाहेगी ना,माँ तो यही कहेगी के बच्चा किसी भी तरह से सन्मार्ग पर चले,अच्छे रास्ते पर चले,अच्छा बनकर रहे और उसके लिए हो सकता हैं माँ को कुछ ऐसा attitude बनाना पढ़े,कुछ ऐसा भाव बनाना पढ़े..

तो दोनों रूप में देखो ,कभी ऐसा होता भी हैं | कई बार ऐसा भी होता हैं हम negatives में बहुत जल्दी अटक जाते हैं | हा... थोड़ा सा हमारे negative होता हैं हम वही अटक जाते हैं और हम कभी कभी तो भगवान को हम शिकवा भी देने लगते हैं के ऐसा क्यों होगया,ऐसा क्यों नही हुआ,तूने ये क्यों कर दिया ,नही..! कोई बात नही..!बहुत से हमारे according हैं..!बहुत से अनुकूल बाते हुई हैं...!बहुत कुछ उसने अनुकूल दिया हैं ...!यदि कही थोड़ा हैं तो उसको भी यही कहो के प्रभु ये भी कोई तेरी इच्छा,तेरी कृपा हो...!

और सच मानो यदि ...किसी प्रतिकूल परिस्थिति  में थोड़ा आप bold रहे ,थोड़ा पक्का रहे ,थोड़ा शांत रहे ,मन को balanced रखे ,मन को बहुत ज्यादा डगमगाने ना दे ,तो वहां प्रभु के कृपा और अच्छे ढंग़ से आप अपने अंदर अनुभव कर सकते हो..!आप ऐसे करे,भगवान ना करे के आपके जीवन में कही कोई प्रतिकूलता आये...लेकिन अगर कही ऐसा होता भी हैं क्युकी संसार हैं ना ,संसार में तो दोनों sides हैं,दोनों opposites pairs हैं संसार में..!फिर भी blessings,best wishes,शुभ कामनाये आपके लिए हैं ही के भगवान ऐसे कृपा करे,अनुकूलता रहे लेकिन मन को फिर भी ऐसा बनाओ के अगर कोई कही प्रतिकूलता हैं भी उसमे भी उसकी कृपा का अनुभव करो,आपको निश्चित वो स्वयं वहां अनुभव होगा....!

गीता सत्संग वीडियो-2 (विडियो लिंक) 

Thursday, 12 November 2015

गीता सत्संग-1


सबको जय श्री कृष्ण...!!!
आइये एक बार फिर करते हैं जीवन की बात,अच्छे जीवन के लिए,जीवन को बनाने के लिए,एक संकेत किया गया था की हम मकान बनाये और कुछ बनाये,बुरा नही,लेकिन उसके साथ साथ अपने जीवन को बनाये...

एक बात ये भी स्पष्ट करले की बिगड़ना बहुत आसान हैं,बनना थोड़ा मुश्किल हैं यधपि असंभव नही,जैसे आप ये समझे की चढ़ना कुछ मुश्किल होता हैं,लेकिन गिरना मुश्किल नही होता,गिरना तो जरा सा पाँव फिसला और निचे कुछ समय भी नही लगेगा ,देर भी नही लगेगी और उसके लिए कुछ एफ्फोर्ट्स भी नही हैं,मेहनत भी नही हैं लेकिन जब चढ़ना होता हैं तो आप जानते हैं की उसके लिए तो एफ्फोर्ट्स होते ही हैं और एक बात साथ और जीवन की लिए समझले चढ़ना वैसे भी मुश्किल हैं लेकिन एक बार गिरकर फिर चढ़ना और भी मुश्किल हो जाता हैं जैसे कमाना मुश्किल हैं लेकिन गवाना बिलकुल मुश्किल नही,गवाने में कुछ नही लगता,की हुई कमाई कभी भी गवाई जा सकती हैं ,कमाने में एफ्फोर्ट्स हैं ,बनने में एफ्फोर्ट्स हैं,बिगड़ने में नही जैसे चढ़ने में एफ्फोर्ट्स हैं गिरने में नही और इसीलिए बहुत जरुरी हैं की जीवन को बनाने की ओर चले,बिगड़ गए तो फिर बनना वैसे ही और मुश्किल हो जायेगा जैसे एक बार गिर कर फिर से चढ़ना ..!आओ जीवन को बनाने के लिए कुछ प्रयास करे..! कुछ भाव बनाये ..! कुछ मन बनाये ..!

जहा बनाने की बात थी वहा कहा जा रहा था की अगर जीवन में हम अहम के साथ जीते हैं इगोइस्टिक फीलिंग के  साथ ,'मैं' के  साथ ,अहंकार के  साथ ,तो वह जीवन के  बिगड़ने की शुरुवात होती हैं..जहा हम जीवन में बहुत हाइपर,इररेटेट,क्रोधित स्वभाव रखकर जीते हैं,वो भी जीवन का एक बिगाड़ हैं,जीवन के बनने की स्तिथि नही हैं |

और ऐसे ही एक बात और पीछे कही गयी की जहा हम आसक्तियों में सिमटे हुए जीते हैं,मेरापन में वहा भी जीवन में डाउन फॉल ही,मानसिक रूप में होता हैं और अपलिफ्ट ,उत्थान ,जीवन में ऊँचा चढ़ने की बात ,जीवन में कुछ बनने की बात आओ आज एक बढ़ा मीठा सा भाव पर थोड़ी देर बात करते हैं बहुत मीठा सा भाव और आपको लगेगा की ये भाव वास्तव में जीवन की एक मिठास हैं 

वो भाव हैं "कृपा" का भाव..एक पक्ष हैं किसी भी वस्तु में की ये देखना की ये मेरा और एक पक्ष हैं किसी वस्तु को इस रूप में देखना की ये भगवन की कृपा..!और सच में कृपा देखने का स्वभाव  बन जायेगा तो आप को लगेगा के जीवन में कुछ अलग सा आनंद ,वही मकान हैं,दृष्टि बढ़लेगी,के ये मेरा नही ये उसकी कृपा का प्रसाद हैं ..

और इसीलिए हमारी परम्पराओ में परम्परा रहती हैं के घर के बाहर भी भगवन का नाम शायद भारत से बाहर में किसी को कुछ कठिनाई रहती हो लेकिन हमे नही लगता के अपनी परम्पराओ में रहना ,परम्पराओ को निभाना या अपनी परम्पराओ को सामने रखना उसमे कही कोई प्रतिबंध होगा या कोई कठिनाई होगी हमे नही लगता और एक बात हम और भी कहे के अपने धर्म अपनी परम्परा अपनी संस्कृति और अपने भगवन के भाव को आगे  रखने में हमे किसी भी तरह का संकोच कोई हिचकिचाहट या कोई शर्म का भाव होना भी नही चाहिए ,इसे तो  हम गौरव में ले..घर के बाहर जब यह कहा जाता हैं  के कोई भगवन का नाम एंट्रेंस पर लिखा हुआ हो वो क्यों हैं?के जब हम घर में एंटर करे ,जब हम घर में प्रवेश करे तो हमे दिखे के ये भगवन के कृपा हैं कोई भी वस्तु हैं हम उसे भगवन की कृपा मान कर प्रयोग करे..


कृपा को प्राप्त करने का एक बढ़ा आसान सा ढंग़ हैं आगे कृपा बनी रहे उसका एक आसान सा ढंग हैं की पहले जो कुछ हैं उसमे उसकी कृपा को देखने का स्वभाव बनाये,उसमे हम उसकी कृपा को स्वीकार करने का भाव बनाये..ये नही जो हैं की उसमे तो  हम अपनी ईगो बनाले,अपना अहम बनाले,उसमे तो हम यह सोचते रहे की ये मैं ,ये मेरा ,मैं इसीलिए बड़ा,मेरे पास इतना कुछ ,मेरे पास ये ,मेरे पास वो और आगे हम ये भी चाहे की भगवन की कृपा भी आगे  और तो  दोनों बातो में थोड़ा सा कंट्रास्ट,कंट्राडिक्शन हैं | चाहते हैं हम उसकी कृपा बनी रहे तो जो पहले हैं उसमे उसकी कृपा का अनुभव करो उसे प्राप्त करके उसकी कृपा का धन्यवाद करो..!!! 


हैं ये प्रशन आपके मन में कभी उठ सकता हैं की कभी कभी कोई परस्तिथि हमारे अनुकूल नही होती तो वहा कैसे हम कृपा देखे तो दोनों बाते हैं ..अनुकूल में हम कृपा देखे..वो तो देखे ही..वो तो कृपा ही... लेकिन अगर हमे कभी लगता हैं की कोई थोड़ा सा हमारे अनुकूल नही हैं तो वहा भी प्रयास करो की ये भी कोई तेरी इच्छा होगी ,ये भी कोई तेरी कृपा होगी ,किस रूप में होगी ये तू जान ,ये भी तेरी लीला होगी ,मेरे गोविन्द ,मेरे ठाकुर ,उसमे भी आप उसका भाव बनाएंगे तो उसके कोई लाभ हैं ..

एक स्तिथि तो इसमे ये हैं विचार के जब भी कोई प्रतिकूलता आती हैं वो कही न कही चेताने के लिए आती हैं ,कुछ हमे और अलर्ट करने लिए ,अवेयर करने के लिए ,कुछ हमे जगाने के लिए ,कुछ पक्का करने के लिए आती .. के ऐसा नही ऐसा ,ये इस ढंग़ से चलो ,अलर्ट करती हैं ,एक बात तो ये हैं और हम थोड़ा अलर्ट हो जाये के कही कोई प्रतिकूलता हैं  तो हम देखे अपने आपको, के हमे नही, ऐसा नही, के अब ऐसा जीवन जीना हैं ...आप देखते ही हैं के  माँ प्यार भी देती हैं ...कभी कभी माँ थोड़ा डांट भी सकती हैं और डांट भी देती हैं..!!!


गीता सत्संग वीडियो -1 (विडियो लिंक)